आज 15 अगस्त को पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा है. इस गौरवशाली सफर के बीच इतिहास के उन पन्नों को पलटना भी जरूरी है, जिनमें कुछ कहानियां ऐसी हैं जो सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा हैं. बीकानेर के एक परिवार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वैद्य मघाराम का परिवार, जिसके तीन सदस्यों ने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया. किसी ने देश निकाला सहा, किसी ने आंदोलन का नेतृत्व किया तो किसी सदस्य ने महज 15 साल की उम्र में तिरंगा फहराकर जेल की सलाखों के पीछे जाना स्वीकार किया.
वैद्य मघाराम की दुधवा खारा आंदोलन में अहम भूमिका
वैद्य मघाराम, उनकी बहन खेतू बाई और उनके पुत्र रामनारायण शर्मा. तीनों ने अलग-अलग दौर में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया. साल 1946 में दुधवा खारा आंदोलन में वैद्य मघाराम की महत्वपूर्ण भूमिका रही. उन्होंने प्रजा परिषद के गठन के जरिए लोगों को संगठित किया और राजशाही के खिलाफ आवाज बुलंद की आंदोलन की. इस मुखरता का खामियाजा भी भुगतना पड़ा, उन्हें देश निकाला दे दिया गया. लेकिन संघर्ष रुका नहीं.
वैद्य मघाराम और उनके बेटे रामनारायण शर्मा की आजादी के आंदोलन में अहम भूमिका रही.
कोलकाता में भी जारी रही लड़ाई
बीकानेर से दूर कोलकाता पहुंचकर भी वैद्य मघाराम ने प्रजा परिषद के गठन और आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम जारी रखा. जगह बदली, परिस्थितियां बदलीं, लेकिन देश को आजाद देखने का सपना नहीं बदला. वहीं, वैद्य मघाराम की बहन और वीरांगना खेतू बाई का भी ऐतिहासिक दुधवा खारा किसान में आंदोलन में योगदान रहा.
रामनारायण शर्मा ने 15 साल की उम्र में ब्रिटिश राज को दी चुनौती
इसी परिवार की अगली पीढ़ी ने भी इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया. वैद्य मघाराम के पुत्र रामनारायण शर्मा ने महज 15 साल की उम्र में बीकानेर में तिरंगा फहराया. उस दौर में तिरंगा फहराना सिर्फ एक प्रतीक नहीं था, बल्कि यह अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती थी. तिरंगा फहराने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. जिस उम्र में बच्चे सपने देखते हैं, उस उम्र में इस परिवार का बेटा देश की आजादी के लिए जेल जाने को तैयार था.
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