Bikaner News: राजस्थान का ऐतिहासिक शहर बीकानेर अपने 539वें स्थापना दिवस (बीकाणा स्थापना दिवस) की तैयारियों में डूबा है. राठौड़ वंश के राव बीका ने जब इस नगर की नींव रखी थी, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यहां की परंपराएं सदियों बाद भी एक वैज्ञानिक संदेश के साथ जिंदा रहेंगी. अक्षय द्वितीया और तृतीया पर आयोजित होने वाले इस उत्सव की रौनक गलियों में दिखने लगी है.
अक्षय रहे शहर, इसलिए बनता है 'अक्षय खिचड़ा'
बीकानेर में स्थापना दिवस पर विशेष 'खिचड़ा' बनाने की परंपरा है. इसमें साबुत मूंग और बाजरे को ओखली में कूटकर तैयार किया जाता है. इसे पीसने के बजाय कूटने के पीछे एक गहरी मान्यता है. महाराजा चाहते थे कि उनका शहर हमेशा 'अक्षय' रहे, यानी उसका कभी क्षय (विनाश) न हो. इसलिए अनाज को खंडित नहीं किया जाता. इसे ढेर सारे देसी घी, मूंगबड़ी की सब्जी और इमली के शरबत के साथ परोसा जाता है.
इमली के शरबत का वैज्ञानिक रहस्य
थार के रेगिस्तान में अप्रैल-मई के महीने में सूरज आग बरसाता है. ऐसे में भारी खिचड़े को पचाने और लू से बचने के लिए इमली का शरबत एक नेचुरल कूलेंट का काम करता है. पूर्वजों ने इस परंपरा को इसलिए जोड़ा ताकि उत्सव के दौरान लोगों का पाचन तंत्र मजबूत रहे और गर्मी उन्हें बीमार न कर सके.
पतंग नहीं 'चंदा' उड़ाने की रीत
मकर संक्रांति पर पूरा देश पतंग उड़ाता है, लेकिन बीकानेर अपने जन्मदिन पर आसमान को सतरंगी करता है. यहां सामान्य चौकोर पतंगों की जगह 'चंदा' (गोल सूर्य नुमा पतंग) उड़ाने की रीत है. माना जाता है कि सूर्यवंशी राजा राव बीका ने 539 साल पहले स्थापना के वक्त गोल सूर्य नुमा पतंग उड़ाई थी. चंदा मोटे कागज से बनता है और इसे सामान्य मांझे के बजाय रस्सी से उड़ाया जाता है. इसे उड़ाना बेहद कठिन होता है, जिसमें कई लोगों की मदद लगती है. आज इन चंदों पर सामाजिक संदेश जैसे 'खेजड़ी बचाओ' और 'बाल विवाह रोको' उकेरे जाते हैं.
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