unique ritual holika Dahan in Mewar: राजस्थान के भीलवाड़ा के मेवाड़ इलाके में तीज-त्योहार अलग ही पहचान रखने वाला होता है. यहां की होली का एक अनूठा अंदाज रहता है. इससे भी ज्यादा यहां अंचल के प्रसिद्ध धर्म क्षेत्र हरणी गांव में होली की बेहद अनोखी और खास परंपरा कई सदियों से लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. जिसके चर्चे दूर- दराज तक सुनने को मिलते है. दरअसल यहां 70 सालों से होलिका दहन (Holika Dahan2026) नहीं किया जा रहा है बल्कि एक अनूठे तरीके से होली ठाण्ड (होलिका दहन स्थल) में सभी के साथ उसका पूजन कर घर की खुशहाली की कामना मांगी जाती है.
सोने के भक्त प्रहलाद
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सोने के भक्त प्रहलाद और चांदी की होलिका की होती है पूजा
इस गांव में होलिका दहन पर सोने के भक्त प्रहलाद और चांदी की होलिका की पूजा की जाती है. मंत्रोचार और रस्मों के बीच चांदी की होलिका की गोद में सोने के भक्त प्रहलाद को बिठाते हैं. पूरे रीति रिवाज के साथ पूजा संपन्न करते है. हरणी गांव में अलग हट कर बनी इस परम्परा के पीछे 70 साल का एक बेहद पुरानी विवाद जुड़ी है. जिसके कारण गांव में इस अनोखे तरीके होलिका पूजन किया जाता है.
हरणी गांव
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70 साल पहले हुए आगजनी विवाद से सीखा था सबक
ग्रामीण गोपाल शर्मा ने गांव की परंपरा के बारे में बताया 70 साल पहले हरणी गांव में भी होलिका दहन होता था. लेकिन करीब 7 दशक पूर्व होलिका दहन के लिए पेड़ काटने को लेकर यहां बेहद गंभीर आगजनी विवाद की घटना हो गयी थी. इस विवाद के कारण गांव वालों का काफी नुकसान हुआ था जिसके बाद उस समय के सभी ग्रामीणों ने तय किया था कि अब होलिक दहन के लिए पेड़ काटकर नहीं पूजन करेंगे. हर घर से अंशदान दिया गया. लेकिन होलिका पूजन की परंपरा को बरकरार रखन के लिए गांव के बड़े बुजुर्गों ने सोने के प्रहलाद और चांदी की होली बनाकर उसकी पूजा शुरु करने का सुझाव दिया. तब से लेकर आज तक होलिका पूजन इसी तरह इस गांव में बदस्तूर जारी है.
होलिका पूजन
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चारभुजा नाथ मंदिर में होलिका की जाती है भक्त प्रहलाद के साथ पूजा
गांव के बुर्जग सोहन लाल तेली ने बताया कि यह गांव 500 साल पुराना है. लेकिन यह परंपरा 70 साल से लगातार चली आ रही है. होलिका पूजन के दिन हरणी गांव बसने के समय ही बनाए गए चारभुजा नाथ मंदिर में होलिका की पूजा होने के बाद ही यहां चांदी की होलिका और सोने के पहलाद भगवान को विराजमान कराया जाता है. कहा कि दहन के दिन हरणी गांव में सभी ग्रामीण चारभुजा मंदिर पर इकट्ठा होते है और फिर ढोल नगाड़ों के साथ पहले शोभा यात्रा गांव से निकाल कर होली ठाण्ड ( होली दहन स्थल) तक ले जाते हैं. फिर सभी पूजा कर वापस मंदिर में लाकर होलिका को स्थापित कर देते हैं.