जेएलएफ: AI साहित्य के लिए खतरा है या उम्मीद?

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विनोद पाठक

भारतीय सभ्यता की एक बड़ी खासियत यह रही है कि उसने ज्ञान को कभी स्थिर नहीं माना. समय के साथ ज्ञान का रूप बदला, माध्यम बदला, लेकिन उसका मूल भाव बना रहा. वेदों की मौखिक परंपरा से लेकर ताड़पत्रों और भोजपत्रों तक, फिर हस्तलिखित पांडुलिपियों से छपाई की मशीन तक और अब डिजिटल दुनिया तक, भारतीय साहित्य ने हर बदलाव को अपनाया. अब एक नया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का दौर सामने है. सवाल यह है कि क्या यह बदलाव भी पहले की तरह स्वाभाविक होगा? या यह साहित्य की आत्मा को ही बदल देगा? 15 जनवरी से शुरू हो रहा जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलएफ)-2026 इसी सवाल के बीच खड़ा दिखाई देगा. बड़ा सवाल, क्या यह मंच साहित्य और तकनीक के बीच संतुलन बना पाएगा? या यह टकराव और गहरा होगा?

दरअसल, भारतीय दर्शन में ‘बुद्धि' का अर्थ केवल तेज दिमाग या गणना (कैलकुलेशन) नहीं है. उपनिषद और गीता बुद्धि को विवेक और नैतिक चेतना से जोड़ते हैं. गीता कहती है, ‘बुद्धियोगेन युज्यस्व' यानी बुद्धि को विवेक से जोड़ो. पर, एआई की बुद्धि कैसी है? वह आंकड़ों पर आधारित है. वह गणना करती है. वह पैटर्न पहचानती है.

अब सवाल उठता है, क्या एआई दुःख को महसूस कर सकती है? क्या वह प्रेम में टूट सकती है? क्या उसे विरह की पीड़ा समझ आती है? क्या वह भक्ति की आग में जल सकती है? अगर नहीं तो क्या वह साहित्य रच सकती है या मात्र उसका ढांचा तैयार कर सकती है?

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भारतीय साहित्य अनुभव से जन्मा है. कबीर की पीड़ा जीवन से आई, मीरा की भक्ति समर्पण से उपजी, प्रेमचंद की कहानियां समाज से निकलीं और महादेवी की वेदना आत्मा से फूटी. ये रचनाएं किसी गणना का परिणाम नहीं थीं. एआई क्या करता है? वह पहले से लिखी गई चीजों को पढ़ता है. उनके आधार पर शब्द चुनता है. संभावनाओं के हिसाब से वाक्य बनाता है. क्या यह सृजन है या अनुकरण? क्या भावों की नकल और भावों का अनुभव एक जैसी चीजें हैं? क्या लेखक की जगह मशीन ले सकती है या मशीन लेखक की मददगार भर है? यही सवाल जेएलएफ-2026 में सबसे अधिक पूछे जाएंगे.

जेएलएफ 2026 का शुभारंभ करते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा
Photo Credit: @BhajanlalBjp

एआई - उम्मीद या चिंता?

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी भाषाई विविधता है. यहां भाषा केवल बोलने का साधन नहीं, बल्कि पहचान है. एआई यहां दो रास्ते खोलता है. एक रास्ता उम्मीद का है. क्या एआई विलुप्त होती भाषाओं को बचा पाएगा? क्या वह पांडुलिपियों को सुरक्षित करेगा? क्या लोक साहित्य को दुनिया तक पहुंचाएगा? दूसरा रास्ता चिंता का है. क्या स्टैन्डर्डिजैशन के नाम पर बोलियां खत्म हो जाएंगी? क्या भाषा से उसका सांस्कृतिक संदर्भ हट जाएगा? क्या अंग्रेजी और बाजार की भाषा हावी हो जाएगी? सवाल स्पष्ट है, क्या एआई भारतीय भाषाओं का रक्षक बनेगा या रिप्लेसमेंट?

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आज की दुनिया में तेजी को सफलता माना जाता है, लेकिन क्या साहित्य की कसौटी भी यही है? एआई बहुत तेज है. वह सेकंडों में कविता लिख सकता है. कहानी बना सकता है. लेख तैयार कर सकता है. लेकिन, क्या तेज होना ही अच्छा होना है? क्या साहित्य का मूल्य तुरंत पसंद किए जाने से तय होता है या वर्षों बाद भी असर छोड़ने से?

दरअसल, भारतीय परंपरा में रचनात्मकता तपस्या है, न की उत्पादन. ऋषि दृष्टा होता है, मशीन नहीं. एक नैतिक सवाल यह भी है कि एआई के साहित्य का लेखक कौन है? मशीन? प्रोग्रामर? डाटा देने वाला समाज? क्या एआई की रचना पर अधिकार किसी का होगा? क्या लेखक का श्रम सस्ता हो जाएगा? क्या साहित्य भी कंटेंट बनकर बाजार के हवाले हो जाएगा? तकनीक से पहले इन सवालों का जवाब जरूरी है.

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बचेगी साहित्य की आत्मा?

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की पहचान हमेशा से संतुलन की रही है. यहां तकनीक को आंख मूंदकर अपनाया नहीं जाता और न ही डरकर खारिज किया जाता है. इस बार सवाल यह नहीं होगा कि एआई आएगा या नहीं, क्योंकि वह आ चुका है. सवाल यह होगा कि हम उसे कहां तक आने देंगे? किस शर्त पर अपनाएंगे? किस सीमा पर रोकेंगे? क्या एआई साहित्य को लोकतांत्रिक बनाएगा या उसे मशीनों और बाजार के हाथों सौंप देगा? क्या भारतीय साहित्य अपनी आत्मा बचा पाएगा? या उसे भी एल्गोरिदम की भाषा सीखनी पड़ेगी?

शायद जेएलएफ-2026 इन सवालों के पूरे जवाब न दे पाए, लेकिन इतना तय है कि अब चुप रहने का समय नहीं है, क्योंकि यह सवाल केवल तकनीक का नहीं, हमारी संवेदना का है.

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और करीब ढाई दशक से पत्रकारिता में सक्रिय है. अमर उजाला, दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में कार्य करने के बाद अब स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और खेल के विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइट में निरंतर लेखन कार्य कर रहे हैं.

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

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