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This Article is From Mar 06, 2026

अनोखा मामला, BSF जवान 22 साल पहले छुट्टी लेने पर हुआ था बर्खास्त, अब राजस्थान हाई कोर्ट ने ऑर्डर VRS में बदला

कोर्ट ने निर्देश दिया कि पेंशन हेतु आवश्यक न्यूनतम सेवा अवधि पूरी करने तक प्रजापति की सेवा को काल्पनिक (नोशनल) नियमित सेवा माना जाए, हालांकि इस अवधि के लिए वह वेतन और भत्तों के हकदार नहीं होंगे.

अनोखा मामला, BSF जवान 22 साल पहले छुट्टी लेने पर हुआ था बर्खास्त, अब राजस्थान हाई कोर्ट ने ऑर्डर VRS में बदला
राजस्थान हाई कोर्ट

Rajasthan High Court: राजस्थान हाईकोर्ट ने बीएसएफ (BSF) के एक जवान को बड़ी राहत देते हुए उसकी करीब 22 साल पुरानी बर्खास्तगी के आदेश को संशोधित कर अनिवार्य सेवानिवृत्ति (VRS) में बदल दिया है. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एस.पी. शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश जवान पवन प्रजापति और केंद्र सरकार द्वारा दायर अपीलों पर संयुक्त सुनवाई के बाद पारित किया. मामले में 27 फरवरी को फैसला किया गया. अदालत ने माना कि प्रजापति से गलती हुई है, मगर उनके अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों के मुकाबले सीधे बर्खास्तगी जैसी कठोर सजा न्यायोचित नहीं है. कोर्ट ने निर्देश दिया कि पेंशन हेतु आवश्यक न्यूनतम सेवा अवधि पूरी करने तक प्रजापति की सेवा को काल्पनिक (नोशनल) नियमित सेवा माना जाए, हालांकि इस अवधि के लिए वह वेतन और भत्तों के हकदार नहीं होंगे.

ज्यादा दिन छुट्टी पर की गई थी कार्रवाई

रिकॉर्ड के अनुसार, पवन प्रजापति को 12 जनवरी 1995 को सीमा सुरक्षा बल में कॉन्स्टेबल (जनरल ड्यूटी) के पद पर नियुक्त किया गया था. साल 2003 में उन्हें 27 अक्टूबर से 4 नवंबर तक आठ दिन की आकस्मिक छुट्टी दी गई थी और 5 नवंबर 2003 को ड्यूटी पर वापस रिपोर्ट करना था.  निर्धारित तिथि पर वह ड्यूटी पर नहीं लौट सके और अपनी अनुपस्थिति का कारण मां की अचानक गंभीर हृदय बीमारी बताते हुए बाद में सामने आए. वे लगभग 77 दिन बाद, 20 जनवरी 2004 को स्वयं यूनिट में लौटकर ड्यूटी पर रिपोर्ट हुए. इसके दौरान विभाग ने उनके खिलाफ स्वीकृत अवकाश से अधिक अवधि तक बिना अनुमति अनुपस्थित रहने के आरोप में विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी.

बर्खास्तगी के खिलाफ हाई कोर्ट में रिट

मामले की सुनवाई संक्षिप्त सुरक्षा बल न्यायालय (एसएसएफसी) में हुई और 8 मार्च 2004 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया. प्रजापति की विभागीय अपील भी 31 अगस्त 2004 को अपीलीय प्राधिकारी ने खारिज कर दी और बर्खास्तगी बरकरार रखी. बर्खास्तगी के खिलाफ प्रजापति ने राजस्थान हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर तर्क दिया कि विभागीय कार्यवाही में प्रक्रियागत खामियां थीं, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ और दी गई सजा अत्यधिक कठोर है. 

19 जुलाई 2023 को हाईकोर्ट की एकलपीठ ने विभागीय आदेशों को रद्द करते हुए प्रजापति को सेवा में पुनः बहाल करने का निर्देश दिया था. हालांकि, सिंगल बेंच ने उन्हें बर्खास्तगी से पुनर्नियुक्ति तक की अवधि के लिए बकाया वेतन देने से इनकार किया और मामले को दोबारा विचार के लिए विभाग को लौटा दिया था.  इस आदेश से दोनों पक्ष संतुष्ट नहीं थे. प्रजापति ने बकाया वेतन व मामला दोबारा विभाग को भेजने के खिलाफ अपील दर्ज की, जबकि केंद्र सरकार ने उनकी पुनर्नियुक्ति के निर्देश को ही चुनौती दी.

हाई कोर्ट ने टिप्पणी कर दिए आदेश

डिवीजन बेंच ने अपने निर्णय में कहा कि विभागीय जांच में मूल प्रक्रियात्मक नियमों का पालन किया गया था और प्रजापति को आरोपों का जवाब देने व गवाहों से जिरह करने का अवसर दिया गया.कोर्ट ने यह भी माना कि प्रजापति 77 दिन तक बिना अनुमति ड्यूटी से अनुपस्थित रहे, इसलिए उनके खिलाफ लगाई गई अनुशासनहीनता के आरोप सिद्ध होते हैं. लेकिन खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि मामला जानबूझकर स्थायी रूप से सेवा छोड़ देने जैसा नहीं है, क्योंकि प्रजापति स्वयं वापस ड्यूटी पर लौटे और उस समय तक उनका सेवा रिकॉर्ड भी अच्छा रहा था. इन परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय ने माना कि सीधे बर्खास्तगी जैसी अत्यधिक कठोर सजा अपराध के अनुपात में उपयुक्त नहीं है और इसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदला जाना चाहिए.

कोर्ट ने संबंधित प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह छह सप्ताह के भीतर आवश्यक औपचारिक आदेश जारी कर पेंशन संबंधी लाभ आदि के लिए आगे की कार्रवाई सुनिश्चित करें.

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