Explainer: सांचौर में झाब और भादरूणा पंचायत समितियों के गठन, कैसे भाजपा की अंदरूनी लड़ाई बन गई ? 

राजस्थान सरकार ने प्रदेश में पंचायतों का पुनर्गठन किया है. इसका कई जगह विरोध भी देखने को मिला है. लेकिन, सांचौर में हो रहे विरोध की ख़ास बात यह कि इस लड़ाई में दोनों पक्ष भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं.

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सांचौर विधायक जीवाराम चौधरी और भाजपा नेता और तीन बार के सांसद रह चुके देवजी पटेल

Sanchore News: सांचौर की राजनीति में पंचायत पुनर्गठन अब महज़ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह सत्ता, प्रभाव और राजनीतिक पकड़ का खुला संकेत बन चुकी है. पहले झाब और अब भादरूणा को नवगठित पंचायत समिति बनाए जाने के फैसलों ने इलाके में राजनीतिक बवाल खड़ा कर दिया है. झाब मुख्यालय पर भाजपा के जिला उपाध्यक्ष महेंद्र सिंह राव सहित करीब दो दर्जन गांव के लोग धरना प्रदर्शन कर रहे हैं.

राज्य सरकार की ओर से 20 नवंबर को जारी अधिसूचना में चितलवाना पंचायत समिति से अलग होकर झाब को नई पंचायत समिति बनाए जाने की घोषणा हुई. इस फैसले को भाजपा नेता और तीन बार के सांसद रह चुके देवजी पटेल की राजनीतिक जीत के रूप में देखा गया. झाब में जश्न का माहौल रहा ढोल-नगाड़े बजे, स्वागत समारोह हुए और मंच से यहां तक कहा गया कि “आप जो लिखकर भेजते हैं, वही सरकार कॉपी-पेस्ट कर देती है.” साथ ही झाब को भविष्य में तहसील बनाए जाने का दावा भी किया गया.

40 दिन में बदल गया पूरा सियासी दृश्य

हालांकि करीब 40 दिन बाद आई संशोधित अधिसूचना ने पूरा परिदृश्य पलट दिया. झाब का नाम हटाकर भादरूणा को पंचायत समिति बनाने का आदेश जारी कर दिया गया. यहीं से साफ हो गया कि यह झाब बनाम भादरूणा की लड़ाई नहीं, बल्कि भाजपा नेता देवजी पटेल और सांचौर विधायक जीवाराम चौधरी के बीच राजनीतिक शक्ति परीक्षण था. इस दौर में बाज़ी जीवाराम चौधरी के खाते में गई.

धरने पर बैठे भाजपा के जिला उपाध्यक्ष महेंद्र सिंह राव और अन्य

तकनीकी भूल या राजनीतिक दबाव?

यदि झाब का नाम पहले तकनीकी गलती से अधिसूचना में शामिल हुआ होता, तो भाजपा के भीतर से मुख्यमंत्री पर सवाल क्यों उठते? भाजपा जिला उपाध्यक्ष महेंद्रसिंह राव निवासी झाब का सार्वजनिक ट्वीट पार्टी के अंदर की नाराज़गी को उजागर करता है. सवाल उठाया गया कि क्या यह फैसला उसी बागी विधायक के लिए इनाम है, जिसने कई बार भाजपा से बगावत की?

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अंदरखाने की सियासत

दरअसल पंचायत पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू होते ही राजनीतिक रस्साकशी तेज हो गई थी. भाजपा से बागी होकर निर्दलीय विधायक बने जीवाराम चौधरी शुरू से अपने पैतृक गांव भादरूणा को पंचायत समिति का दर्जा दिलाने में जुटे थे. दूसरी ओर देवजी पटेल झाब को आगे बढ़ा रहे थे, जहां भाजपा के प्रभावशाली नेता महेंद्र सिंह राव और पूर्व जिलाध्यक्ष श्रवण सिंह राव बोरली का मजबूत प्रभाव है.

संदेश साफ: पावर सेंटर कौन?

झाब की जगह भादरूणा को पंचायत समिति बनाना सांचौर की राजनीति में साफ संदेश देता है कि मौजूदा पावर सेंटर आज भी जीवाराम चौधरी हैं. वही जीवाराम, जिन्होंने चार बार भाजपा से बगावत की, लेकिन दो बार निर्दलीय चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे. 

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चुनावी गणित का ताज़ा अध्याय

राजनीति के जानकार कहते हैं कि भाजपा यह भी मानती है कि सांचौर में जीवाराम चौधरी जैसी जमीनी पकड़ वाला विकल्प अब तक खड़ा नहीं हो पाया है. शायद यही वजह है कि तमाम संगठनात्मक नाराज़गी के बावजूद सरकार का झुकाव उस नेता की ओर रहता है, जो चुनाव जिताने की क्षमता रखता हो भले ही वह पार्टी लाइन से बार-बार बाहर क्यों न गया हो. झाब से भादरूणा तक का यह फेरबदल साफ करता है कि सांचौर में पंचायत समिति का फैसला प्रशासनिक कम और राजनीतिक ताकत का पैमाना ज़्यादा है.

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