Holi 2026: कहीं दहकते अंगारों पर 'वॉक', तो कहीं पत्थरों से लहूलुहान होते हैं लोग; रोंगटे खड़े कर देगी डूंगरपुर की ये परंपरा

Holi 2026 Date: आपने कभी ऐसी होली देखी है जहां लोग दहकते अंगारों पर चलते हैं या गुलाल की जगह पत्थरों से एक-दूसरे का खून बहाते हैं? राजस्थान के डूंगरपुर की ये परंपराएं आपको हैरान कर देंगी.

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Holi 2026: राजस्थान में होली का मतलब सिर्फ अबीर और गुलाल नहीं है. प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले डूंगरपुर (वागड़ अंचल) में होली 1 महीने तक (पूरे फाल्गुन महीने) मनाई जाती है, लेकिन यहां की कुछ परंपराएं इतनी अनोखी और रोंगटे खड़े कर देने वाली हैं कि इन्हें देखने के लिए दुनियाभर से लोग खींचे चले आते हैं. यहां की होली आस्था, साहस और जोखिम का एक ऐसा मेल है, जिसे देखकर आप अपनी उंगलियां दांतों तले दबा लेंगे.

पांव के नीचे दहकते अंगारे और अटूट विश्वास

सुनने में यह किसी फिल्म के सीन जैसा लग सकता है, लेकिन डूंगरपुर के कोकापुर गांव में लोग सचमुच आग से खेलते हैं. यहां होलिका दहन के अगले दिन सुबह-सुबह सैकड़ों ग्रामीण जलती हुई होली के दहकते अंगारों पर नंगे पांव चलते हैं. ताज्जुब की बात यह है कि धधकती आग पर चहलकदमी करने के बावजूद किसी का पैर नहीं जलता. ग्रामीणों का मानना है कि ऐसा करने से गांव पर कोई विपदा नहीं आती और साल भर हर कोई निरोगी रहता है. हजारों सालों से चलती आ रही इस परंपरा में आज तक कोई अनहोनी नहीं हुई है.

बरसाने की लट्ठमार भी पड़ जाए फीकी, यहां बरसते हैं पत्थर

अगर आपको लगता है कि लट्ठमार होली सबसे चुनौतीपूर्ण है, तो आपको भीलूड़ा गांव की 'पत्थरों की राड़' देखनी चाहिए. पिछले 200 सालों से यहां रंगों की जगह पत्थरों से होली खेली जा रही है. धुलंडी के दिन लगभग 400 लोग दो टोलियों में बंट जाते हैं और एक-दूसरे पर गोफन और हाथों से पत्थर बरसाते हैं. एक वर्ग किलोमीटर के दायरे में होने वाले इस 'पत्थर युद्ध' को देखने के लिए हजारों की भीड़ जुटती है.

खून बहना यहां दर्द नहीं, बल्कि 'गुड लक' है

इस पत्थरमार होली का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा इसका परिणाम है. पत्थरों की बारिश में जब प्रतिभागियों के सिर फटते हैं और खून बहता है, तो वे भागते नहीं बल्कि और उत्साह से झूम उठते हैं. इस परंपरा में खून बहने को आने वाले साल के लिए बेहद शुभ शगुन माना जाता है. हालांकि, सुरक्षा के लिहाज से मौके पर डॉक्टरों की टीम तैनात रहती है, लेकिन घायलों के चेहरे पर दर्द के बजाय जीत की मुस्कान होती है.

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गैर नृत्य की थाप पर थिरकता वागड़

सिर्फ आग और पत्थर ही नहीं, डूंगरपुर की होली में लोक संस्कृति की मिठास भी है. देवल और जेठाना जैसे गांवों में ढोल की थाप पर 'गैर' खेलने की परंपरा उत्सव को एक अलग ही रंग देती है. एक तरफ जहां कोकापुर और भीलूड़ा में साहस का प्रदर्शन होता है, वहीं इन गांवों में पारंपरिक वेशभूषा में ग्रामीण नृत्य कर प्राचीन भारतीय संस्कृति का जश्न मनाते हैं.