Great Indian Bustard Day Special: राजस्थान का राज्य पक्षी गोडावण (Great Indian Bustard) जो कभी पश्चिमी भारत के विशाल और हरे-भरे घास के मैदानों की शान हुआ करता था, आज वजूद की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहा है. इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्सर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट में इसे 'क्रिटिकली एंडेंजर्ड' यानी गंभीर रूप से लुप्तप्राय श्रेणी में रखा गया है. पूरे देश में अब सिर्फ जैसलमेर (Jaisalmer) ही ऐसा इकलौता सुरक्षित ठिकाना बचा है, जहां यह दुर्लभ पक्षी खुले आसमान के नीचे सांस ले पा रहा है.
एक तरफ जहां वैज्ञानिकों के आधुनिक प्रयास और ब्रीडिंग सेंटर्स उम्मीद जगा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पिछले 8 सालों से जंगलों में इनकी थमी हुई रफ्तार ने वन्यजीव प्रेमियों की चिंता बढ़ा दी है.
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'टेस्ट ट्यूब' और AI तकनीक से बढ़ी संख्या
गोडावण को विलुप्त होने से बचाने के लिए साल 2018 में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और राजस्थान वन विभाग के बीच एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय समझौता हुआ था. इसके तहत जैसलमेर के 'सम' और 'रामदेवरा' में विशेष कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर बनाए गए. इन सेंटर्स में वैज्ञानिकों ने कमाल कर दिखाया है. वर्तमान में दोनों केंद्रों को मिलाकर कुल 87 गोडावण सुरक्षित हैं. रामदेवरा में 62 और सम में 25 गोडावण हैं.
क्या है 'जम्प स्टार्ट' तकनीक?
इस आधुनिक तकनीक के तहत जंगल के असुरक्षित अंडों को सेंटर लाया जाता है और सेंटर के एडवांस स्टेज वाले अंडों को वापस जंगल में रख दिया जाता है. इससे अंडे शिकारियों जैसे आवारा कुत्ते या लोमड़ी से बच जाते हैं और जल्दी बच्चे बाहर आते हैं.
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टनल में दी जाएगी ट्रेनिंग
राष्ट्रीय मरु उद्यान (DFO) के वन अधिकारी बृज मोहन गुप्ता ने बताया कि अब इस संरक्षण कार्यक्रम का अगला और सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू होने जा रहा है, जिसे 'फ्री रिलीज' या 'री-वाइल्डिंग' कहते हैं. इसके लिए रामदेवरा सेंटर में एक विशेष री-वाइल्डिंग टनल बनाई जा रही है. यहां सेंटर में पैदा हुए गोडावण के बच्चों को प्राकृतिक माहौल में रहने, शिकार से बचने और खुद दाना खोजने की ट्रेनिंग दी जाएगी, जिसके बाद इन्हें खुले जंगल में छोड़ दिया जाएगा.
जंगल में 8 साल से क्यों थमी है आबादी?
ब्रीडिंग सेंटर की क्रेडिबिलिटी और कामयाबी के बीच सबसे बड़ा और परेशान करने वाला सवाल जंगल की आबादी को लेकर है. आंकड़े बताते हैं कि साल 2017-18 में जंगल में गोडावण की संख्या 128 (प्लस-माइनस 19) थी. साल 2025-26 में यह संख्या महज 130 (प्लस-माइनस 21) तक ही पहुंच पाई है. यानी करोड़ों रुपये के बजट और वैज्ञानिक दावों के बावजूद पिछले 8 साल में खुले जंगल में गोडावण की आबादी लगभग स्थिर बनी हुई है.
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कौन बन रहा गोडावण का दुश्मन?
एशियन वाटर बर्ड सर्वे के राज्य समन्वयक डॉ. सुमित डूकिया (एसोसिएट प्रोफेसर, इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी) ने इस स्थिरता पर चिंता जताते हुए कहा, 'पिछले कुछ सालों में खुले जंगल में केवल 6 से 7 नए बच्चे ही बड़े होते दिखे हैं. इसका सबसे बड़ा कारण इनके आवास का टूटना है. हरी-भरे घास के मैदान खत्म हो रहे हैं और रेगिस्तान में बिछा हाईटेंशन बिजली लाइनों का जाल इनके लिए काल बन चुका है. भारी वजन होने के कारण उड़ते वक्त गोडावण इन तारों को देख नहीं पाते और टकराकर दम तोड़ देते हैं. स्थिति यह है कि जैसलमेर में भी गोडावण की आबादी अब दो हिस्सों में बंट चुकी है और आपस में उनका मिलना-जुलना बंद हो गया है.'
वहीं पर्यावरणविद पार्थ जगाणी का कहना है कि सिर्फ सेंटर्स में संख्या बढ़ाना काफी नहीं है. जब तक हम गोडावण के असली प्राकृतिक घर यानी 'ओरण' और पारंपरिक घास के मैदानों को नहीं बचाएंगे और स्थानीय ग्रामीणों को इस मुहिम से नहीं जोड़ेंगे, तब तक वाइल्ड आबादी को बढ़ाना मुमकिन नहीं होगा.
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