गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय: भवन करोड़ों के, पर शिक्षक ‘मेहमान', आदिवासी छात्रों का भविष्य गेस्ट फैकल्टी के भरोसे

विश्वविद्यालय के कुलपति के. एस. ठाकुर का कहना है कि विश्वविद्यालय की स्थापना के समय ही 30 शैक्षणिक पद स्वीकृत किए गए थे, लेकिन अभी तक इन पदों पर भर्ती नहीं हो पाई है. उन्होंने बताया कि पदों को भरने के लिए सरकार को पत्र लिखकर अवगत कराया गया है.

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बांसवाड़ा जिले में स्थित गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 2017 में बड़े उद्देश्य के साथ की गई थी—वागड़ अंचल के तीन जिलों के हजारों आदिवासी छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा का अवसर देने के लिए. उस समय विश्वविद्यालय के लिए 30 शैक्षणिक और 40 गैर-शैक्षणिक पद स्वीकृत किए गए थे. लेकिन विडंबना यह है कि स्थापना के लगभग आठ साल बाद भी ये पद आज तक भरे नहीं गए. परिणाम यह है कि विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले करीब 1400 विद्यार्थियों की पढ़ाई स्थायी शिक्षकों के बजाय अतिथि शिक्षकों के भरोसे चल रही है.

इमारतों का “विश्वविद्यालय”, शिक्षकों का “अतिथि गृह”

विश्वविद्यालय के लिए लगभग 120 बीघा जमीन आवंटित की गई, जिसमें से करीब 80 बीघा जमीन पर करोड़ों रुपये खर्च कर भव्य इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर दिया गया. परिसर में परीक्षा नियंत्रक भवन, शोध भवन, माही भवन, अकादमिक भवन, स्टूडियो अपार्टमेंट, कौटिल्य भवन, दो हॉस्टल, गुलाब वाटिका और छात्र कल्याण भवन सहित कई सुविधाएं मौजूद हैं. इसके अलावा पीएम उषा योजना के तहत पांच नए भवनों का निर्माण भी जारी है. कुल मिलाकर लगभग 50 करोड़ रुपये की लागत से भवन खड़े हो चुके हैं. अब सवाल यह उठ रहा है कि इतनी इमारतों के बीच स्थायी शिक्षक आखिर कब “स्थापित” होंगे?

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पढ़ाई का भार 67 अतिथि शिक्षकों पर

विश्वविद्यालय में वर्तमान में पीजी, इंजीनियरिंग, एलएलएम सहित कई कोर्स संचालित हो रहे हैं. लेकिन इन सभी पाठ्यक्रमों की पढ़ाई विद्या संबल योजना के तहत लगाए गए 67 अतिथि शिक्षकों द्वारा करवाई जा रही है. अर्थात विश्वविद्यालय की स्थायी व्यवस्था फिलहाल “अस्थायी शिक्षकों” के भरोसे चल रही है.

विकास के दावों के बीच शिक्षा की अनदेखी

एक तरफ सरकारें आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के विकास के लिए अनेक योजनाओं की घोषणा करती हैं और विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं. वहीं दूसरी ओर शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधा में इस तरह की लापरवाही कई सवाल खड़े करती है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय में नियमित शिक्षकों की भर्ती नहीं होगी, तो उच्च शिक्षा का स्तर कैसे बेहतर होगा और आदिवासी क्षेत्र के छात्रों का भविष्य किस दिशा में जाएगा.

नेताओं के ज्ञापन भी नहीं बदल पाए हालात

क्षेत्र के कई आदिवासी नेताओं ने समय-समय पर विश्वविद्यालय में शिक्षकों की भर्ती की मांग को लेकर ज्ञापन और पत्र भी दिए. लेकिन इन मांगों का परिणाम अब तक कागजों तक ही सीमित नजर आ रहा है. अब हालात ऐसे हैं कि विश्वविद्यालय में करोड़ों रुपये की इमारतें खड़ी हैं, परिसर विकसित है, छात्र पढ़ रहे हैं—लेकिन शिक्षक अब भी “मेहमान” ही बने हुए हैं.

कुलपति का पक्ष

विश्वविद्यालय के कुलपति के. एस. ठाकुर का कहना है कि विश्वविद्यालय की स्थापना के समय ही 30 शैक्षणिक पद स्वीकृत किए गए थे, लेकिन अभी तक इन पदों पर भर्ती नहीं हो पाई है. उन्होंने बताया कि पदों को भरने के लिए सरकार को पत्र लिखकर अवगत कराया गया है. कुलपति के अनुसार वर्तमान में विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए गेस्ट फैकल्टी के माध्यम से नियमित रूप से कक्षाएं संचालित करवाई जा रही हैं. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या वागड़ अंचल के आदिवासी विद्यार्थियों का भविष्य भी अतिथि व्यवस्था पर ही चलता रहेगा, या फिर कभी इस विश्वविद्यालय में स्थायी शिक्षक भी नियुक्त होंगे.

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