बेल रूल है... उमर खालिद की जमानत के सवाल पर पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने गिनाई 3 कंडीशन

पूर्व सीजेआई ने जेएलएफ में कहा कि क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की प्रॉब्लम ये है कि ट्रायल रीजनेबल टाइम में खत्म नहीं होते. अगर ऐसा है, तो आर्टिकल 21 के तहत राइट टू स्पीडी ट्रायल वायलेट होता है.

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पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़

पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ रविवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल हुए है. इस दौरान पूर्व सीजेआई ने उमर खालिद की जमानत से लेकर भ्रष्टाचार तक, तमाम मुद्दें पर बात की. चंद्रचूड़ ने कहा कि मैं भ्रष्टाचार को जस्टिफाई नहीं कर रहा, लेकिन जज भी सोसाइटी से आते हैं. सोसाइटी में भ्रष्टाचार है, लेकिन जज से हाईयर कॉलिंग एक्सपेक्टेड है. इसे रोकने के लिए जवाबदेही तय करने के लिए एफिशिएंट सिस्टम चाहिए. गलत फैसले पर भ्रष्ट कहना आसान है, लेकिन सच्चाई देखना जरूरी है.

उमर खालिद के केस पर क्या बोले चंद्रचूड़

चंद्रचूड़ ने कहा कि मैं बेबी बूमर पीढ़ी का हूं, लेकिन मेरी दो बेटियां हैं, जो स्पेशल नीड्स वाली हैं और जेन जी हैं तो अगर मुझे उनकी जिंदगी से जुड़ा रहना है तो मुझे जेन जी के काम करने का तरीका फॉलो करना पड़ेगा. अपनी किताब का जिक्र करते हुए चंद्रचूड़ ने कहा कि ये स्पीचेज की किताब है. सख्त कानूनी किताब नहीं है. मैं इसे पढ़ रहा था, रेफरेंस देखे तो अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट, इंडियन सुप्रीम कोर्ट, फिलॉसफर जैसे जॉन स्टुअर्ट मिल, कांट वगैरह की उम्मीद के मुताबिक चीजें हैं. 

जब मैं समलैंगिकता अपराधमुक्त करने वाला फैसला लिख रहा था तो मुझे लियोनार्ड कोहेन का कोट याद आया. वह कोट 'डेमोक्रेसी इन सम डेंजर' के बारे में था. मैने सोचा कि ये फैसला फ्लोरिश वाला होना चाहिए. कुछ फैसले बीच रोड पर लिखे जाते हैं, कुछ में थोड़ा फ्लोरिश डालते हैं. 

डीवाई चंद्रचूड़

पूर्व सीजेआई

वहीं उमर खालिद के केस पर जब उनसे सवाल पूछा गया तो वे बोले मैं अब जज के तौर पर नहीं, नागरिक के तौर पर बोल रहा हूं. मैं इस केस को समझाने के लिए कानून को सरलता से समझाता हूं. किसी भी दोषसिद्धि से पहले जमानत मिलने अधिकार का मामला है, क्योंकि हमारा कानून इनोसेंस की पूर्वधारणा पर टिका है.

हर आरोपी निर्दोष माना जाता है जब तक ट्रायल में दोषी साबित न हो. प्री-ट्रायल बेल पनिशमेंट नहीं हो सकती. अगर 5-7 साल अंडरट्रायल रहकर बरी हो गया तो खोया समय कैसे कंपनसेट करोगे? 

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बेल के लिए मना कब करते हैं, इसे आसान उदाहरण से समझिए.

  • मान लो सीरियल रेपिस्ट-मर्डरर, 6-7 रेप-मर्डर के आरोप में गिरफ्तार है. अगर छोड़ दिया तो सोसाइटी में अपराध दोहरा सकता है. ये क्लासिक केस है बेल डिनाय का.

  • दूसरा, अगर बेल पर छूटने के बाद ट्रायल के लिए उपलब्ध न रहे, भाग जाए.
  • तीसरा, एविडेंस से छेड़छाड़ करे.

अगर ये तीनों एक्सेप्शन न हों तो बेल नियम है. आज की प्रॉब्लम ये है कि नेशनल सिक्योरिटी वाले कानून इनोसेंस को गिल्ट से रिप्लेस कर देते हैं. कोर्ट को चेक करना चाहिए कि नेशनल सिक्योरिटी सच में इन्वॉल्व है या नहीं. डिटेंशन प्रोपोर्शनल है या नहीं. वरना लोग सालों जेल में सड़ते रहते हैं.

'ट्रायल नहीं हो सकता तो बेल रूल है'

आखिरी पॉइंट, क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की प्रॉब्लम ये है कि ट्रायल रीजनेबल टाइम में खत्म नहीं होते. अगर ऐसा है, तो आर्टिकल 21 के तहत राइट टू स्पीडी ट्रायल वायलेट होता है. भले ही कोई कानून बेल डिनाय करे, कांस्टीट्यूशन सुप्रीम है. इसलिए एक्सेप्शन न हों तो बेल मिलनी चाहिए. खालिद को जेल में 5 साल हो गए. मैं अपनी कोर्ट की आलोचना करने में हिचकिचा रहा हूं, क्योंकि साल भर पहले मैं इंस्टीट्यूशन लीड कर रहा था. लेकिन ये प्रिंसिपल्स बताते हैं कि कंडीशंस लगा सकते हो, लेकिन एक्सपीडिशस ट्रायल का हक देखना पड़ेगा.

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अगर ट्रायल नहीं हो सकता तो बेल रूल है. उन्होंने कहा हाइकोर्ट और जिला अदालतों में बेल ना देने की आदत है. चिंता की बात, जिला अदालतें पहला इंटरफेस है. इसकी वजह, कंट्री में अथॉरिटी पर डिस्ट्रस्ट का कल्चर है. जज सोचते हैं, बेल दी तो मोटिव पर सवाल होगा. फाइनेंशियल फ्रॉड के केस में जज की इंटरग्रिटी पर शक जायेगा. बेहतर है कि हाईकोर्ट को जाने दो. नतीजा ये है कि सुप्रीम कोर्ट पर 70,000 केस सालाना आ रहे हैं. 

डीवाई चंद्रचूड़ ने आगे कहा कि यदि डिस्ट्रिक्ट जज गलत बेल दे, जैसे दहेज हत्या केस में, रिवर्स करो. लेकिन मोरल दबाव मत डालो. ये इकोसिस्टम बनाता है जहां जज डरते हैं. हाईकोर्ट की स्मॉल ऑब्जर्वेशन करियर डिस्ट्रॉय कर देती है, प्रमोशन पर असर पड़ता है. ये ट्रायल जज के असेसमेंट का इश्यू है. 

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