जैसलमेर: 'कुत्ते को दिखते हैं 2 रंग, मुर्गी को 3...', मोहन भागवत ने जैन दर्शन के जरिए समझाया एकता का फॉर्मूला

Rajasthan News: जैसलमेर में प्रसिद्ध 'चादर महोत्सव' में शामिल होने के बाद ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जैन दर्शन के जरिए अनुयायियों को एकता का अर्थ बताया.

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RSS Chief Mohan Bhagwat
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RSS Chief Mohan bhagwat News: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत शुक्रवार को राजस्थान की स्वर्ण नगरी जैसलमेर पहुंचे. यहां उन्होंने प्रसिद्ध 'चादर महोत्सव' में शिरकत की. साथ ही मीडिया से बातचीत करते हुए जैन दर्शन के प्रति अपने अनुभवों को सांझा किया. जिसमें RSS चीफ भागवत ने भारतीय संस्कृति, विविधता में एकता और जैन दर्शन के 'अनेकांतवाद' पर गहरे विचार साझा किए. उन्होंने इसके लिए कुत्ते और मुर्गी का उदाहरण देकर इसके महत्व को समझाया. 

कुत्ते और मुर्गी के उदाहरण से समझाया 'सत्य' का नजरिया

डॉ. भागवत ने बहुत ही सरल उदाहरणों के माध्यम से 'दृष्टिकोण की मर्यादा' को समझाया. उन्होंने कहा कि आज की भाषा में कहे तो उसमें एक सॉफ्टवेयर है,वो  वैसा ही देखता है, जैसा हम देखना चाहते है इससे ज्यादा वो नहीं देख सकता है. इस बात को उन्होंने कुत्ते और मुर्गी के उदाहरण  को देकर समझाया. उन्होंने कहा कि मनुष्य सात रंगों को देख सकता है जबिक कुत्ते केवल दो रंग (सफेद और काला) दिखते हैं, जबकि मुर्गी को तीन ही रंग दिखाई देते हैं.  यदि ये दोनों जीव दुनिया का वर्णन करेंगे, तो उनके अनुभव अलग-अलग होंगा, जबकि वस्तु एक ही है. इसी विचार को जैन दर्शन में 'अनेकांत' कहा गया है.

ज्ञान की धाराएं अलग पर सबका उद्देश्य एक

संघ प्रमुख ने समाज में एकता का आह्वान करते हुए कहा कि भारत में श्रवण और ब्राह्मण परंपराओं से ज्ञान की दो अलग-अलग धाराएं चलीं, लेकिन सबका उद्देश्य एक ही है. उनका मानना है कि हम सभी मूल रूप से समान हैं क्योंकि परमात्मा एक ही है. क्योंकि जब समाज में अनेकता का आभास होने लगता है, तो अलगाव की स्थिति पैदा होने में देर नहीं लगती. इसलिए हमें सदैव एकता पर ही ध्यान रखना चाहिए क्योंकि हमें विविधता में ही एकता का वास होता है. 

दादा गुरुदेव की चादर संस्कृति का अटूट प्रतीक

डॉ. भागवत ने दादा गुरुदेव के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी चादर महज एक वस्त्र नहीं, बल्कि समाज के लिए किए गए उनके महान कार्यों का प्रमाण है. दादा गुरुदेव के कार्य ऐसे हैं जो वर्षों बाद भी न अग्नि में जले, न शस्त्रों से कटे और न ही पानी से भीगे. यह चादर आज भी हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है और हमारी संस्कृति के चमत्कारों का प्रतीक है. उन्होंने प्रयाग के अक्षयवट का उदाहरण देते हुए कहा कि सत्य शाश्वत और एक ही होता है. 

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