दुनिया को हराने वाले विश्वनाथन आनंद आखिर अपनी मां से क्यों हार जाते हैं? JLF में किया चौंकाने वाला खुलासा

Rajasthan News: जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के मंच पर शतरंज के जादूगर और पांच बार के विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद ने माइंड, AI और मानवीय भावनाओं से जुड़े सवालों और विषयों पर चर्चा की.

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Viswanathan Anand
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Viswanathan Anand: गुलाबी नगरी में आयोजित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के मंच पर शतरंज के जादूगर और पांच बार के विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद पहुंचे, तो चर्चा सिर्फ चेस के काले और सफेद मोहरों तक ही सीमित नहीं रही. बल्कि साहित्यकुंभ के मंच पर उनसे माइंड, AI और मानवीय भावनाओं से जुड़े सवालों और विषयों पर चर्चा की जटिल सवालों पर उन्होंने बड़े साफगोई और सधे हुए अंदाज में इन विषयों पर अपनी राय रखी. .इसके साथ ही उन्होंने अपनी मां के साथ अपने अनोखे रिश्ते पर भी बात  की.

मां के साथ हारने की खुशी और जीवन के पदक

जब उनसे पूछा गया कि उन्हें सबसे ज्यादा खुशी कब मिली-वर्ल्ड चैंपियनशिप जीतने पर या नागरिक सम्मान मिलने पर? तो आनंद ने बड़ी सादगी से जवाब दिया. उन्होंने कहा कि खुशियों की रैंकिंग नहीं की जा सकती. उन्होंने एक बेहद भावुक बात साझा करते हुए कहा कि मैं आज भी अपनी मां के साथ ताश  खेलता हूं और अक्सर उनसे हार जाता हूं. मुझे उनके साथ खेलकर हारना पसंद है क्योंकि वहां हारना मुझे खुश करता है.

याददाश्त के लिए कलम उठाना जरूरी

उन्होंने AI के बढ़ते कदमों और हर क्षेत्र में इसकी पहुंच पर जवाब देते हुए इसे डिपेंडेंट गैजेट्स का नाम दिया. उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल दौर में हर लोग हर छोटे काम के लिए गैजेट्स पर निर्भर हैं. जो हमेशा प्रभावी नहीं रहती. आनंद ने कहा कि कोई गैजेट आपकी बातों को रिकॉर्ड कर सकता है या टास्क याद दिला सकता है, लेकिन हमारी याददाश्त एक अलग तरह से काम करती है. इसलिए इनपर निर्भर रहने की बजाय हम अपनी जरूरी चीजें हाथ से लिखें. क्योंकि लिखने से दिमाग उसे बेहतर तरीके से सहेजने में मदद करता है.

प्रयोग करना बेहतर होता है

इसके बाद गैजेट्स चर्चा को दूर छोड़ते हुए वह अपने पसंदीदा विषय शतरंज की दुनिया से जुड़े किस्से और अपने अनुभवों को शेयर किया. उन्होंने कहा कि हारने के बाद गुस्सा आना स्वाभाविक है. कई बार ऐसी स्थिति आती है कि आप अपने प्रतिद्वंदी को नापसंद करने लगते हैं. लेकिन शतरंज का असली मास्टर वही है जो इन भावनाओं पर काबू पा ले और अगले मूव पर ध्यान दे. इसी बीच उन्होंने उस पल को भी याद किया जब आनंद ने 2007 के  ग्रैड स्लैम को जीतते हुई की थी. जिसने उन्हें यह भी सिखाया की प्रयोग करना बेहतर होता है. 

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2007 वर्ल्ड चैंपियनशिप का वो 'गेम चेंजिंग' फैसला

दरअसल 2007 में जब उन्होंने व्लादिमीर क्रैमनिक के खिलाफ खेले मैच में अपनी चाल पर प्रयोग करते हुए उसे बदला.  इस बारे में अब सोचते हुए वह इसे एक साहसी प्रयोग कहते है. क्योंकि उनका मानना है कि  लगातार अपनी सामान्य चाल को प्रतिदूंदी समझ जाता है. इसलिए उस समय शुरुआत के सेट्स में  हारने के बाद मैंने खुद को और प्रतिद्वंदी को चौंकाने का फैसला किया. और अपना पुराना गेम छोड़कर नई चाल चली. यह कुछ वैसा ही था जैसे अपनी मातृभाषा छोड़कर अचानक दूसरी भाषा में बात करने जैसा. ये जोखिम भरा था  लेकिन बढ़त बनाने के लिए यह जरूरी था.

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'नई चाल' खोजना चुनौती नहीं बल्कि AI के जवाबों को समझना है

आधुनिक शतरंज में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका को आनंद ने एक अलग नजरिया पेश किया. उनके अनुसार, पहले दिमाग नई चालें खोजने में लगता था, लेकिन अब AI सेकंडों में इसे विस्तार से आपके सामने  निकाल के रख देता है. इसी कारण अब चुनौती 'नई चाल' खोजना नहीं, बल्कि AI के  सुझाए जा रहे जवाब को समझना है. क्योंकि AI से बात करना और उसके साथ प्रयोग करना एक अलग स्तर की दिमागी थकान और जटिल एक्सरसाइज जो दिमाग में नई चीजें दिखाने के  साथ साथ उसके सोचने की क्षमता को बढ़ा रही है, लेकिन अगर इसका संभल कर प्रयोग नहीं किया तो यह दिमाग की ग्रोथ को रोक सकती है.


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