कोटा कोचिंगः सपने, सुसाइड और सवाल - Analysis

कोटा सहित कई शहरों में हर साल कई छात्र इसी मानसिक तनाव की वजह से आत्महत्या कर लेते हैं. लेकिन क्या इस पूरी व्यवस्था में माता-पिता, कोचिंग सेंटर या सरकार किसी की भी ज़िम्मेदारी तय नहीं होती है?

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Kota: राजस्थान विधानसभा में कोचिंग सेंटरों को नियमित करने वाला बिल पारित नहीं हो पाया, और अगले ही दिन कोटा से एक और दिल दहला देने वाली खबर आ गई. 17 साल के एक NEET की तैयारी कर रहे छात्र ने सुसाइड कर लिया. पहले उसने पंखे से लटकने की कोशिश की, लेकिन जब सुरक्षा डिवाइस ने उसे रोक दिया, तो उसने जिम की रॉड का सहारा लिया. सुबह से कमरे में बंद बिहार से पढ़ने आए इस छात्र की जिंदगी आखिरकार हमेशा के लिए ठहर गई. राजस्थान के कोचिंग हब्स, खासतौर पर कोटा जयपुर सीकर पिछले कुछ सालों से इसी तरह की ख़बरों की वजह से सुर्खियों में हैं. सबसे  बुरा हाल “एजुकेशन सिटी” कोटा का है. इस शहर में हर साल लाखों छात्र डॉक्टर-इंजीनियर बनने का सपना लेकर आते हैं. लेकिन बहुत से सपने अधूरे रह जाते हैं, और कई बार इसकी वजह बनता है. कोचिंग सेंटरों का कठोर माहौल, माता-पिता की उम्मीदों का बोझ और असीमित मानसिक दबाव. 

एक बच्चा जिसने 12वीं पास करते ही घर छोड़ा हो, जो पहली बार माँ-बाप से दूर किसी अजनबी शहर में आया हो. हॉस्टल की चार दीवारों के बीच रहकर दिन-रात सिर्फ पढ़ाई करना, हर टेस्ट में टॉप करने का दबाव, रिजल्ट आने पर टीचर और दोस्तों की जजमेंट झेलना और फिर घर फोन करने पर माता-पिता की बड़ी उम्मीदें सुनना, यह सब उसे अंदर से तोड़ने के लिए काफी है. 

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कोटा सहित कई शहरों में हर साल कई छात्र इसी मानसिक तनाव की वजह से आत्महत्या कर लेते हैं. कई तो बिना बताए घर लौट आते हैं और उनकी कोचिंग की लाखों की फीस बेकार चली जाती है. लेकिन क्या इस पूरी व्यवस्था में माता-पिता, कोचिंग सेंटर या सरकार किसी की भी ज़िम्मेदारी तय नहीं होती है?

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भजन लाल सरकार ने दिखाई इच्छाशक्ति 

मौजूदा भजनलाल सरकार ने इस दिशा में इच्छाशक्ति दिखाई, और कोचिंग सेंटरों के लिए एक नियमन बिल कैबिनेट में पारित किया. लेकिन विधानसभा में यह बिल पारित नहीं हो सका और आखिरकार प्रवर समिति को भेज दिया गया. इस तरह, कोचिंग सेंटर सिस्टम को सुधारने की उम्मीद एक बार फिर पीछे छूट गई.

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अब सवाल यह है कि इस बिल के पारित न होने के पीछे असल वजह क्या है? क्या सरकार की तैयारी अधूरी थी, या फिर विपक्ष का यह आरोप सही है कि सरकार कोचिंग सेंटरों की लॉबी के दबाव में आ गई? फ़िलहाल, यह मामला कम से कम छह महीने के लिए टलता हुआ नज़र आ रहा है.

हज़ारों करोड़ की है कोचिंग इंडस्ट्री 

इसमें कोई दो राय नहीं है की पिछले दो दशक से राजस्थान के प्रमुख शहरों जयपुर, सीकर और कोटा में कोचिंग सेंटरों का अद्भुत गति से विस्तार हुआ है. प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती मांग, निजी शिक्षा संस्थानों का उदय और छात्रों में करियर के प्रति जागरूकता ने इस इंडस्ट्री को विशाल रूप दे दिया है. विशेषज्ञों के अनुसार, कोचिंग सेंटर अब केवल शैक्षिक तैयारी का माध्यम नहीं रहे, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं. 

अकेले कोटा शहर में हर साल करीब 2 लाख छात्र मेडिकल और इंजीनियरिंग परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं. यहाँ कोचिंग इंडस्ट्री का कारोबार 6000 करोड़ रुपये से अधिक का है, इस इंडस्ट्री ने कोटा में 1 लाख से अधिक लोगों को रोजगार दिया है. कोचिंग के कारण शहर में हॉस्टल, पीजी, मैस, ट्रांसपोर्टेशन, रेस्टोरेंट, स्टेशनरी और अन्य व्यवसाय भी फल-फूल रहे हैं. कोचिंग सेंटरों की सालाना फीस 40 हजार से 1.5 लाख रुपये तक होती है. 

हालांकि, इस विकास के साथ कई समस्याएँ भी खड़ी हो गई हैं. जिनमें गुणवत्ता में असमानता, अत्यधिक शुल्क वसूली, पारदर्शिता की कमी, अनुचित संचालन और छात्रों के बढ़ते सुसाइड बड़ी परेशानी बन चुके हैं. इन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए सरकार ने इस नियमन बिल का प्रस्ताव रखा था, जिससे कोचिंग सेंटरों के संचालन पर नियंत्रण लाया जा सके.

कोटा में हर साल करीब 2 लाख छात्र मेडिकल और इंजीनियरिंग परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं. यहाँ कोचिंग इंडस्ट्री का कारोबार 6000 करोड़ रुपये से अधिक का है, इस इंडस्ट्री ने कोटा में 1 लाख से अधिक लोगों को रोजगार दिया है.

बिल में क्या प्रावधान थे?

सरकार के इस बिल में कई महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़े गए थे.

• पंजीकरण अनिवार्य करना – सभी कोचिंग सेंटरों का राज्य स्तर पर पंजीकरण ज़रूरी होगा.

• फीस पर नियंत्रण – मनमाने तरीके से लाखों की फीस वसूलने पर रोक लगेगी.

• शिकायत निवारण तंत्र – छात्रों, अभिभावकों और कर्मचारियों के लिए एक हेल्पलाइन और शिकायत तंत्र बनेगा.

• छात्रों की मानसिक स्थिति की जाँच – हर कोचिंग सेंटर में एक मनोचिकित्सक की नियुक्ति अनिवार्य होगी. हालांकि, इसे किस स्तर पर लागू किया जाएगा, यह बिल में स्पष्ट नहीं था.

• नाबालिग छात्रों का प्रवेश – केंद्र सरकार की गाइडलाइन के अनुसार, 16 साल से कम उम्र के छात्रों को कोचिंग में एडमिशन नहीं दिया जाएगा. लेकिन इस शर्त को बाद में बिल से हटा दिया गया, जिससे इसकी काफ़ी आलोचना हुई. जबकि ड्राफ्ट बिल में कहा गया था कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों को कोचिंग सेंटर में प्रवेश नहीं दिया जाएगा, क्योंकि इस उम्र में उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए स्कूल में रहना ज़रूरी है.

इसके अलावा हर छात्र जो कोटा आता है, वह डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन सकता. ऐसे में सभी छात्रों के लिए एक एप्टीट्यूड टेस्ट अनिवार्य किया जाना चाहिए, जिससे उनकी क्षमता के अनुसार सही करियर मार्गदर्शन मिल सके.

केंद्र सरकार की गाइडलाइन के अनुसार, 16 साल से कम उम्र के छात्रों को कोचिंग में एडमिशन नहीं दिया जाएगा. लेकिन इस शर्त को बाद में बिल से हटा दिया गया, जिससे इसकी काफ़ी आलोचना हुई.

विपक्ष के आरोप, सरकार का तर्क और कोचिंग इंडस्ट्री की चिंता

विपक्ष के प्रमुख नेता टीकाराम जूली ने इस मुद्दे पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका तर्क है कि सरकार कोचिंग सेंटर संचालकों की मज़बूत लॉबी के दबाव में आ गई, जिसके कारण वह इस बिल को लेकर निर्णय लेने में असमर्थ रही. विपक्ष के नेताओं का कहना है कि जब तक कोचिंग सेंटर संचालकों की लॉबी का प्रभाव बना रहेगा, तब तक किसी भी कठोर रेगुलेशन को लागू करना चुनौतीपूर्ण रहेगा.

सरकार की ओर से इस बिल को प्रवर समिति को भेजने पर यह तर्क दिया गया है कि जो सुझाव आए हैं, उन्हें शामिल किया जाएगा. सरकार का कहना है कि यह बिल आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा है, लिहाज़ा इसे मज़बूत और बेहतर होना चाहिए. प्रवर समिति की रिपोर्ट और पुलिस के इनपुट के आधार पर संशोधित बिल तैयार किया जाएगा और इसे आगामी सत्र में पारित करवाया जाएगा.

उधर, इंडस्ट्री से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि सरकार ने इस मुद्दे पर उचित संवाद नहीं किया. यदि बिल आधे-अधूरे रूप में लागू कर दिया जाता, तो इससे इंडस्ट्री को भी नुकसान हो सकता था.

सरकार का दावा है कि अगले सत्र में बिल को और अधिक मज़बूत रूप में लाया जाएगा, लेकिन क्या ये वास्तव में हो पाएगा या फिर बेहतर परिणाम के भारी दबाव में स्टूडेंट ऐसे ही फंदे पर झूलते रहेंगे. सवाल सिर्फ एक बिल का नहीं, बल्कि उन मासूम जिंदगियों का है जो हर साल कोचिंग सेंटरों की ऊँची इमारतों में अपना बचपन और कभी-कभी अपनी जान भी खो बैठते हैं.

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