'बिजनेस, बंगला और बैंक बैलेंस, सबकुछ छोड़ा', मुंबई के करोड़पति परिवार ने अचानक लिया चौंकाने वाला फैसला!

मुंबई के वाशी में दुग्गड़ परिवार का करोड़ों का कारोबार था. पिछले कई वर्षों से प्लास्टिक कारोबार से जुड़ी फैमिली ने सबकुछ त्याग दिया है. पढ़िए विशाल खंडेलवाल की रिपोर्ट.

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परिवार मूल रूप से जालोर जिले के तीखी गांव से जुड़ा है.

सिरोही के जीरावला जैन तीर्थ में भावुक और चौंकाने वाला दृश्य देखने को मिला. जिले में एक ही परिवार के 4 सदस्यों ने एक साथ मोह-माया त्याग कर जैन दीक्षा ग्रहण कर ली. दुग्गड़ परिवार का कनेक्शन मूल रूप से जालोर जिले के तीखी गांव से है. यह फैमिली पिछले कुछ वर्षों से मुंबई के वाशी में प्लास्टिक कारोबार से जुड़ी हुई थी. लेकिन अचानक लिए गए इस फैसले ने हर किसी को हैरान कर दिया. माता-पिता और दोनों बच्चों ने एक ही मंच पर जैन दीक्षा लेकर सांसारिक जीवन का त्याग कर वैराग्य का रास्ता अपना लिया.

दीक्षा के बाद दिए गए ये नाम

  • अनिल दुग्गड़- मुनिश्री आज्ञासार रत्न विजय
  • पत्नी समता- साध्वी श्री सम्यज्ञानी रेखा श्रीजी
  • 15 वर्षीय पुत्र दक्ष- मुनि दृष्टिसार रत्न विजय
  • 13 वर्षीय प्राकृत- मुनि प्रीतिसार रत्न विजय

इन शब्दों से बदल गई पूरी सोच

जिसने भी दीक्षा विधि को देखा, उसके मन में इस फैसले की वजह को जानने की उत्सुकता भी थी. बताया जा रहा है कि इस परिवार के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब उन्होंने ‘वैराग्य शतक' का गहन अध्ययन किया. इन शब्दों ने सोच बदली और सोच ने फिर पूरा जीवन. जहां आम इंसान के लिए सब कुछ छोड़ना असंभव लगता है, वहीं इस परिवार ने ऐशो-आराम छोड़ संन्यास की तरफ रूख कर लिया.

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परिवार के सभी सदस्य अब सांसारिक जीवन को त्याग चुके हैं.

जयकारों से गूंज उठा परिसर

जैसे ही दीक्षा की पावन विधि पूरी हुई, पूरा परिसर “नूतन दीक्षित अमर रहो” के जयकारों से गूंज उठा. आचार्य रश्मिरत्न सूरीश्वरजी के सान्निध्य में हुए दीक्षा ग्रहण की परंपरा पूरी हुई. इस महोत्सव में देव वंदन, प्रदक्षिणा और गुरु पूजन जैसे पारंपरिक अनुष्ठानों ने माहौल को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया. अपने प्रवचन में आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य जन्म, धर्म का श्रवण, श्रद्धा और सच्चा आचरण अत्यंत दुर्लभ हैं और मुनि जीवन इन सभी का सर्वोच्च रूप है.

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