Makar Sankranti: मकर संक्रांति के मौके पर वैसे तो पतंग उड़ाने का पुराना रिवाज है. लेकिन राजस्थान के टोंक में मकर संक्रांति एक अलग परंपरा से मनाई जाती है, जो रियासत काल से चली आ रही है. इसमें 80 किलो वजनी फुटबॉल की तरह दड़े से फुटबॉल का खेल खेला जाता है. कहा जाता है कि फुटबॉल की तरह टोंक के आवां कस्बे में हर साल 14 जनवरी को 12 गांव के हजारों लोग जुटते हैं. यह भी कहा जाता है कि रियासतकाल में यह खेल सेना में भर्ती के लिए होता था लेकिन अब अकाल और सुकाल का संकेत के लिए खेलते हैं.
इस खेल के रिजल्ट के पीछे भी एक अकाल - सुकाल की परंपरा जुड़ी हुई हैं. खेलते-खेलते यह आवा अखनियाँ दरवाजा की ओर चला जाता है तो प्रदेश में अकाल पड़ेगा और यह दड़ा दूनी दरवाजा की ओर चला जाता है तो सुकाल के संकेत मिलते है. दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक खेला जाने वाला यह दडा चौक में ही रह गया तो न तो अकाल माना जाएगा और ना सुकाल माना जाएगा. यह सामान्य साल का संकेत माना जाएगा.
यह केवल टोंक में खेला जाता है
इस गेम की सुखद बात यह है इसमे कोई गिर जाता है तो उसे विरोधी टीम के खिलाडी भी तत्काल उठा लेते है. ग्रामीणों का दावा है कि ऐसे 80 किलो के दड़े का आयोजन दुनिया में राजस्थान के टोंक जिले के आवां कस्बे के अलावा अन्य जगह कही भी नहीं होता है. आवां की तत्कालीन रियासत से जुड़े आदित्य सिंह ने बताया कि उनके दादाजी के समय से इस खेल का आयोजन उनकी ओर से हर साल करवाया जा रहा है. यह यहां की परंपरा है, जिसे देश भर से लोग देखने के लिए आते है.
इसे और भव्य बनाने के लिए पंचायत प्रशासन भी सहयोग करती है. सरपंच दिव्यांश एम भारद्वाज ने बताया कि तत्कालीन आवां रियासत की की इस महोत्सव का आयोजन करवाया जाता हैं. इस खेल को लोग आज भी भाईचारे से खेलते हैं. इस बार भी लोग उत्साह के साथ इसे खेलने के लिए आतुर है. इसके सफल आयोजन के लिए पंचायत की ओर से पूरे इंतजाम किए गए है.
जूट से तैयार करते है दड़े को
इस दड़े को राजपरिवार के सदस्य गढ़ में तीन -चार दिन पहले जूट को रस्सियों से गूंथ कर तैयार करवाते है. अभी इसे तैयार कर करवा लिया है और इसका वजन 80 किलो करने के लिए पानी में डूबो दिया जाता है. 14 जनवरी को सुबह निकाल लिया जाता है. फिर उसे दोपहर 12 बजे खेलने के लिए गोपाल चौक में रखवा दिया जाता है.
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