सावन का महीना भगवान शिव की आराधना और जलाभिषेक के लिए विशेष माना जाता है. इस दौरान राजस्थान सहित देशभर के धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है. शेखावाटी की अरावली पर्वत श्रृंखला में स्थित प्राचीन लोहार्गल धाम भी इन दिनों आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. श्रद्धालु यहां स्थित पवित्र जलधारा और सूर्यकुंड से कावड़ में जल भरकर पैदल यात्रा करते हैं, और विभिन्न शिव मंदिरों में भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं. लोहार्गल धाम अपनी प्राचीन पौराणिक मान्यताओं और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है.
"पांडवों ने सूर्यकुंड में किया था स्नान"
मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद पांडव हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर विभिन्न तीर्थों की यात्रा पर निकले थे. श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया था कि जिस तीर्थ के जल में उनके अस्त्र-शस्त्र गल जाएंगे, वहीं उन्हें पापों से मुक्ति मिलेगी. कहा जाता है कि पांडव जब लोहार्गल पहुंचे, और सूर्यकुंड में स्नान किया तो उनके लोहे के अस्त्र-शस्त्र पानी में गल गए. इसके बाद उन्हें पापों से मुक्ति मिली. इसी मान्यता के कारण इस स्थान का नाम लोहार्गल पड़ा. आज भी श्रद्धालुओं में मान्यता है कि सूर्यकुंड में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिलती है. बाबा खाटूश्याम जी का संबंध भी धार्मिक तीर्थ स्थल लोहार्गल से माना जाता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार बर्बरीक का शीश लोहार्गल की जलधारा के माध्यम से खाटू पहुंचा था.
"लोहार्गल को प्रथम तीर्थ स्थल माना जाता है"
लोहार्गल धाम के प्राचीन सूर्य मंदिर के पीठाधीश्वर अवधेशाचार्य महाराज के अनुसार, लोहार्गल को धरती का प्रथम तीर्थ स्थल माना जाता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने इसी क्षेत्र में मत्स्य अवतार लेकर शंकासुर राक्षस का वध किया था. भगवान विष्णु के चरण स्पर्श से यहां का जल पवित्र हुआ, और यह स्थान मोक्ष प्राप्ति का स्थल माना जाने लगा. मान्यता के अनुसार, यहां से सात पवित्र जलधाराएं निकलीं, जिनमें लोहार्गल, किरोड़ी यानी कर्कोटिका, शाकंभरी, नागकुंड, टपकेश्वर, शोभावती और खोरीकुंड प्रमुख हैं. पहाड़ों से निकलने वाली जलधारा आज भी अनवरत सूर्यकुंड में गिरती है.
परशुराम की यज्ञभूमि भी लोहार्गल
लोहार्गल का संबंध भगवान परशुराम से भी बताया जाता है. मान्यता है कि क्षत्रियों के संहार के बाद भगवान परशुराम को जब अपने किए का पश्चाताप हुआ तो उन्होंने लोहार्गल में तपस्या और यज्ञ किया. वर्तमान सूर्य मंदिर के स्थान के पास ही यज्ञ वेदी बनाकर उन्होंने यज्ञ किया था. इस दौरान भगवान सूर्य को सपत्नी यज्ञ में आमंत्रित किया गया था. लोहार्गल में प्राचीन सूर्य मंदिर के साथ शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, गणेश मंदिर और पांडव मंदिर भी श्रद्धालुओं की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं.
कावड़ियों से गुलजार रहता है लोहार्गल
सावन के महीने में लोहार्गल से जल भरकर श्रद्धालु कावड़ यात्रा पर निकलते हैं. पैदल यात्रा करते हुए श्रद्धालु अपने-अपने गंतव्य तक पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं. कई श्रद्धालु गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे तीर्थ स्थलों से भी पवित्र जल लेकर भगवान शिव को अर्पित करते हैं. इसके साथ ही लोहार्गल के सूर्य क्षेत्र की 24 कोसीय परिक्रमा का भी विशेष धार्मिक महत्व है. इसके अलावा सोमवती अमावस्या, सूर्य सप्तमी और कृष्ण जन्माष्टमी सहित विभिन्न धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.
खाटूश्यामजी से भी जुड़ा है लोहार्गल
लोहार्गल धाम के पीठाधीश्वर अवधेशाचार्य जी महाराज ने बताया कि बाबा खाटूश्यामजी का संबंध भी लोहार्गल से माना जाता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार, बर्बरीक का शीश लोहार्गल की जलधारा के माध्यम से खाटू पहुंचा था. इसी कारण बाबा श्याम की धार्मिक परंपरा में भी लोहार्गल से जुड़ी मान्यताओं का उल्लेख मिलता है. लोहार्गल की सबसे ऊंची चोटी पर भगवान शिव का स्थान केदारनाथ के नाम से प्रसिद्ध है. श्रद्धालु इसे भी पापों से मुक्ति और शिव आराधना का महत्वपूर्ण स्थल मानते हैं.
धार्मिक कॉरिडोर और रोपवे बनाने की मांग
पीठाधीश्वर अवधेशाचार्य महाराज ने सरकार से लोहार्गल सहित शेखावाटी के प्रमुख धार्मिक स्थलों को जोड़कर धार्मिक कॉरिडोर विकसित करने की मांग की. उन्होंने कहा कि खाटूश्यामजी, शाकंभरी माता, जीणमाता और सालासर धाम जैसे प्रमुख धार्मिक स्थल शेखावाटी में है. यदि इन धार्मिक स्थलों को बेहतर सड़क, रोपवे और अन्य सुविधाओं से जोड़ा जाए तो श्रद्धालुओं के साथ पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. लोहार्गल धाम की प्राचीन मान्यताएं, निरंतर बहती जलधारा, सूर्यकुंड और अरावली की पहाड़ियों के बीच बसे धार्मिक स्थल को देखने के लिए पूरे साल देश-विदेश से श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं. सावन में कावड़ यात्राओं के चलते यहां आस्था का विशेष नजारा देखने को मिल रहा है.
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