सुप्रीम कोर्ट ने पोंग डैम विस्थापितों से जुड़े भूमि आवंटन विवाद मामले में नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए हिमाचल हाईकोर्ट में जारी राजस्थान सरकार के अधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही पर रोक लगा दी है. साथ ही कोर्ट ने यह अहम सवाल उठाया है कि क्या अवमानना के अधिकार का इस्तेमाल मूल आदेशों से आगे जाकर ठोस राहत देने के लिए किया जा सकता है? जस्टिस जेके माहेश्वरी और अतुल एस चंद्रुरकर की पीठ ने 'स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम अश्विनी कुमार शर्मा और अन्य' केस की सुनवाई की.
पोंग डैम पुनर्वास योजना का है मामला
दरअसल, विवाद 'पोंग डैम पुनर्वास योजना' के तहत राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र में भूमि आवंटन को लेकर है. याचिकाकर्ता ने एक विशेष मुरब्बा (भूमि खंड) देने की मांग की थी. राज्य सरकार का कहना है कि उसके पिता को पहले ही भूमि आवंटित की जा चुकी है, जो राजस्थान कॉलोनाइजेशन नियम, 1972 के तहत पूरे परिवार के लिए मान्य होती है.
सरकार ने उच्च स्तरीय कमेटी का दिया हवाला
राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि 29 मार्च 2011 के मूल रिट आदेश में किसी विशेष भूमि के आवंटन का निर्देश नहीं था. इसके बावजूद हाईकोर्ट ने अवमानना कार्यवाही के दौरान एक विशेष मुरब्बा आवंटित करने, कब्जा दिलाने और अधिकारियों के खिलाफ बाध्यकारी निर्देश जारी कर दिए. राज्य के अनुसार. यह अवमानना प्रक्रिया को निष्पादन कार्यवाही में बदलने जैसा है.
राजस्थान सरकार ने यह भी कहा कि जिस भूमि के आवंटन का आदेश दिया गया है, वह इंदिरा गांधी नहर कॉलोनी के फेज-I में उपलब्ध ही नहीं है. एक उच्च स्तरीय समिति पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि वहां विवाद-मुक्त भूमि उपलब्ध नहीं है और फेज-II में आवंटन का विकल्प सुझाया गया है.
हाईकोर्ट में लंबित सभी अवमानना पर रोक
अवमानना कार्यवाही शुरू होने के बाद राज्य ने मामला अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा को सौंपा. सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की गई. राज्य की ओर से एएसजी ऐश्वर्या भाटी और एएजी शिव मंगल शर्मा ने पक्ष रखा. सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए हाईकोर्ट में लंबित सभी अवमानना कार्यवाहियों पर रोक लगा दी है.
अवमानना के मामले में अहम फैसला
इस पूरे मामले में सबसे अहम मुद्दा यह बन गया है कि क्या अदालतें अवमानना के जरिए मूल आदेश से आगे बढ़कर नया अधिकार या राहत दे सकती हैं? सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य में अवमानना कानून की सीमाएं तय करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय साबित हो सकता है.
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