पुष्कर शिविर के बाद कांग्रेस के भीतर नए समीकरण को लेकर चर्चा है. राहुल गांधी के दौरे के बाद कई तरह के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं. सुगबुगाहट इस वजह से भी तेज हैं क्योंकि उन्होंने खुले तौर पर गोविंद डोटासरा और टीकाराम जूली की तारीफ की. इसे पूरे देश के लिए मॉडल भी बताया. इसे महज औपचारिक प्रशंसा के तौर पर नहीं देखा जा रहा है, बल्कि कांग्रेस के भीतर एक बड़े राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है.
नेताओं की खींचतान का तोड़ मिल गया!
कांग्रेस लंबे समय से कई राज्यों में संगठन और विधायक दल के बीच तालमेल की चुनौती से जूझती रही है. ऐसे समय में राजस्थान से आई तस्वीर राहत भरी है. राहुल गांधी ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि डोटासरा-जूली मिलकर अच्छा काम कर रहे हैं. कांग्रेस के राज में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच गुटबाजी भी चुनौती बनी थी. साल 2023 के चुनाव में मिली हार के बाद कांग्रेस में नई कवायद शुरू हुई. संगठन और विपक्ष की भूमिका को अलग-अलग शक्ति केंद्र बनाने की बजाय एक साझा रणनीति के तहत आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया.
डोटासरा-जूली के बीच लक्ष्मण रेखा तय
पीसीसी चीफ डोटासरा ने संगठन को सक्रिय करने, आंदोलनों का नेतृत्व करने और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने में जुटे रहे. जूली ने विधानसभा के भीतर आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाई और सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेरने का काम किया. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दोनों नेताओं ने अपनी-अपनी जिम्मेदारियों की स्पष्ट लक्ष्मण रेखा तय की. कभी एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की कोशिश नहीं की. यही कारण है कि कांग्रेस के भीतर इस जोड़ी को कई नेता और कार्यकर्ता 'जय और वीरू' की जोड़ी के तौर पर देखने लगे हैं.
सड़क से लेकर सदन तक भी कांग्रेस में तालमेल
डोटासरा ने सदन के भीतर हमेशा टीकाराम जूली को नेता प्रतिपक्ष के रूप में पूरा सम्मान दिया. विधानसभा से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने कभी समानांतर नेतृत्व की छवि बनाने का प्रयास नहीं किया. दूसरी ओर, टीकाराम जूली ने भी हर बड़े मंच से यह संदेश दिया कि सरकार के खिलाफ लड़ाई प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के नेतृत्व और संगठन की ताकत के सहारे ही लड़ी जाएगी. कई मौकों पर दोनों नेता एक-दूसरे की भूमिका की खुलकर सराहना करते दिखाई दिए. सड़क पर आंदोलन हो या विधानसभा के भीतर सरकार को घेरने की रणनीति, दोनों नेताओं की राजनीतिक लाइन लगभग एक जैसी दिखाई दी.
जब भी डोटासरा और जूली दिल्ली में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे या अन्य केंद्रीय नेताओं से मिलने पहुंचे. तब दोनों ने कभी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं या एक-दूसरे के खिलाफ शिकायतों की राजनीति नहीं की. दोनों नेताओं ने हमेशा राजस्थान में संगठन और विपक्ष की संयुक्त रणनीति पर ही चर्चा की.
राहुल गांधी की बात के मायने क्या?
- डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के नेतृत्व पर शीर्ष नेतृत्व का भरोसा कायम है.
- कांग्रेस आलाकमान फिलहाल राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन या शक्ति संतुलन को लेकर चल रही अटकलों को कोई महत्व नहीं देना चाहता.
- राहुल गांधी की सार्वजनिक प्रशंसा के बाद डोटासरा और जूली दोनों का राजनीतिक कद बढ़ा है. इससे राजस्थान कांग्रेस में उनका प्रभाव और मजबूत होगा.
- कांग्रेस 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए संगठन और नेता प्रतिपक्ष के तालमेल पर जोर रहेगा.
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