राजस्थान का ₹550 करोड़ गुजरात के हिस्से में जाएगा, जानिए फिर भी नर्मदा जल विवाद सुलझने से कैसे होगा फायदा

राजस्थान सरकार का दावा है कि नर्मदा जल विवाद सुलझने से राजस्थान के कई जिलों को सीधा फायदा होगा. चारों राज्यों के विवाद का समाधान पाने के लिए साल 1969 से कोशिश जारी है.

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समझौते के तहत, राजस्थान की ओर से गुजरात को करीब 550 करोड़ रुपये दिए जाएंगे.

राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच 47 साल से चला आ रहा नर्मदा जल विवाद सुलझ गया है. इस समझौते के साथ ही सरदार सरोवर परियोजना की लागत साझेदारी और लंबित भुगतान से जुड़े विवाद समाप्त हो जाएंगे. राजस्थान अपनी हिस्सेदारी के तहत करीब 550 करोड़ रुपए गुजरात को देगा. दरअसल, इस समझौते पर मुहर 4 जुलाई को पचपदरा रिफाइनरी के उद्घाटन समारोह में ही लग गई थी. जब पीएम नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए राजस्थान की तत्कालीन सीएम वसुंधरा राजे के साथ हुए सहयोग का उल्लेख किया था. उन्होंने कहा था कि बिना किसी विवाद के नर्मदा का पानी राजस्थान तक पहुंचाया गया. उन्होंने इसे सहकारी संघवाद का उदाहरण बताते हुए राज्यों के बीच जल विवादों को संवाद और सहमति से सुलझाने की बात कही. वहीं, विवाद सुलझने के बाद सीएम भजनलाल शर्मा की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. 

दिल्ली में हुए इस समझौते को लेकर लोगों के मन में कई सवाल हैं. क्या गुजरात अब राजस्थान को अधिक पानी देगा? क्या नर्मदा जल का नया बंटवारा हुआ है? इन सभी सवालों का जवाब समझना जरूरी है. जानिए इस समझौते की पूरी इनसाइड स्टोरी. 

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पश्चिमी राजस्थान के इन जिलों को होगा फायदा

हरियाणा के साथ यमुना जल समझौते के बाद अब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सरकार की नजर नर्मदा नदी के पानी पर है. भजनलाल सरकार का दावा है कि इससे पश्चिमी राजस्थान में नर्मदा परियोजना के अधूरे काम तेजी से पूरे होंगे और राजस्थान को उसके हिस्से का पानी बेहतर तरीके से मिल सकेगा. इसका सीधा फायदा जालोर, सांचौर, बाड़मेर और सिरोही जिलों में पेयजल और सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है. हजारों गांवों को पीने का पानी मिलता है और लाखों हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है.

साल 1969 से चला आ रहा है विवाद

नर्मदा नदी मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलकर महाराष्ट्र और गुजरात से होती हुई अरब सागर में मिलती है. नदी पर सरदार सरोवर सहित कई बड़ी सिंचाई और जल विद्युत परियोजनाएं बनाई गईं. इन परियोजनाओं से मिलने वाले पानी के बंटवारे, बांध निर्माण की लागत और पुनर्वास को लेकर मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच लंबे समय तक विवाद चलता रहा.

इसी विवाद को सुलझाने के लिए केंद्र सरकार ने 1969 में नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT) का गठन किया गया. करीब 10 साल तक सुनवाई चली और 1979 में न्यायाधिकरण ने अपना अंतिम फैसला सुनाया. न्यायाधिकरण ने उपयोग योग्य 28 मिलियन एकड़ फीट पानी का चारों राज्यों में बंटवारा किया. राजस्थान का हिस्सा केवल 0.50 एमएएफ तय किया गया. यह पानी गुजरात के सरदार सरोवर बांध से नर्मदा मुख्य नहर के जरिए राजस्थान तक पहुंचता है. इसके अलावा मध्य प्रदेश का 18.25, गुजरात का 9 और महाराष्ट्र का 0.25 एमएएफ हिस्सा तय किया गया. 

प्रोजेक्ट पर खर्च को लेकर राज्यों के दावों से विवाद

1979 में पानी का हिस्सा तय हो गया था, लेकिन सरदार सरोवर परियोजना के निर्माण की लागत, भूमि अधिग्रहण, डूब क्षेत्र, पुनर्वास, सरकारी परिसंपत्तियों और अन्य खर्चों को लेकर राज्यों के बीच वित्तीय विवाद चलता रहा. परियोजना की लागत लगातार बढ़ती गई. गुजरात सरकार का तर्क था कि उसने परियोजना पर अधिक खर्च किया है, इसलिए अन्य राज्यों को अपनी लागत हिस्सेदारी का भुगतान करना चाहिए. दूसरी ओर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र ने भी अपने खर्चों का दावा किया. राजस्थान की लागत हिस्सेदारी भी वर्षों तक लंबित रही. यही विवाद धीरे-धीरे अदालतों तक पहुंच गया और लगभग 5 दशक बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका.

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गुजरात ने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान पर कुल करीब 7,974.86 करोड़ रुपये का दावा किया था. इसमें राजस्थान पर लगभग 574.52 करोड़ रुपये की देनदारी बताई गई. मध्य प्रदेश ने गुजरात पर करीब 7,669 करोड़ रुपये का दावा किया, जबकि महाराष्ट्र ने लगभग 3,000 करोड़ रुपये की मांग रखी. राजस्थान की ओर से सरदार सरोवर परियोजना में लागत साझेदारी के तहत लगभग 556 करोड़ रुपये का मामला लंबित था.

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में दिल्ली में चारों राज्यों ने वन-टाइम सेटलमेंट पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते के तहत सभी लंबित वित्तीय दावों का अंतिम निपटारा किया जाएगा. राजस्थान भी अपनी लागत हिस्सेदारी के रूप में लगभग 550 करोड़ रुपए गुजरात को देगा. इसके बाद चारों राज्यों के बीच दशकों से चले आ रहे भुगतान विवाद समाप्त हो जाएंगे.

रेगिस्तानी इलाके के किसानों के लिए साबित होगा वरदान!

खास बात यह है कि यह समझौता पानी के बंटवारे का नहीं है. राजस्थान का हिस्सा पहले भी 0.50 एमएएफ था और आज भी उतना ही है. यानी ना तो एक बूंद पानी की बढ़ोतरी हुई है और ना ही कटौती की गई है. प्रदेश को मिलने वाला सबसे बड़ा लाभ यह है कि दशकों से चल रहे वित्तीय विवाद समाप्त होने के बाद परियोजना से जुड़े विकास कार्यों में तेजी आने की संभावना है.

भजनलाल सरकार का फोकस नहर तंत्र को मजबूत करने और अंतिम छोर तक पानी पहुंचाने पर है. 

पश्चिमी राजस्थान में लंबे समय से शिकायत रही है कि कई बार नहर के अंतिम हिस्सों तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंचता. किसान भी समय-समय पर इस मुद्दे को उठाते रहे हैं. सरकार का मानना है कि प्रशासनिक और वित्तीय बाधाएं दूर होने के बाद इस दिशा में सुधार संभव होगा. यमुना जल समझौते के बाद अब सरकार नर्मदा परियोजना को अगले बड़े जल मिशन के रूप में देख रही है.

इसके साथ ही 2026-27 के बजट में मानसून के दौरान मिलने वाले अतिरिक्त जल के भंडारण की योजना की घोषणा की गई है. इसके लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार किया जा रहा है. नर्मदा अवार्ड के अनुसार मानसून में मिलने वाले अतिरिक्त पानी का उपयोग संबंधित राज्य अपने क्षेत्र में कर सकता है और यह उसके निर्धारित हिस्से में नहीं जोड़ा जाता. अगर अतिरिक्त पानी का वैज्ञानिक तरीके से भंडारण हो जाता है तो भविष्य में पश्चिमी राजस्थान के जल संकटग्रस्त क्षेत्रों को बड़ी राहत मिल सकती है.

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