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This Article is From Apr 09, 2026

डिप्टी एसपी सहित 4 पुलिसकर्मियों के खिलाफ हाई कोर्ट ने रद्द किया FIR, कहा- बिना सुनवाई नहीं दर्ज होगा केस

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आरोप सरकारी कर्मचारियों के आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े हों, तो बिना उन्हें सुनवाई का अवसर दिए सीधे FIR दर्ज कराने का आदेश देना कानून के अनुरूप नहीं है. 

डिप्टी एसपी सहित 4 पुलिसकर्मियों के खिलाफ हाई कोर्ट ने रद्द किया FIR, कहा- बिना सुनवाई नहीं दर्ज होगा केस
राजस्थान हाई कोर्ट

Rajasthan News: राजस्थान हाईकोर्ट जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में डिप्टी एसपी सहित चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज किए जाने वाले आपराधिक मामलों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश देते हुए श्रीगंगानगर के विशेष न्यायाधीश द्वारा दिए गए एफआईआर दर्ज करने के आदेश को निरस्त कर दिया. हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आरोप सरकारी कर्मचारियों के आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े हों, तो बिना उन्हें सुनवाई का अवसर दिए सीधे FIR दर्ज कराने का आदेश देना कानून के अनुरूप नहीं है. 

मामला एक आपराधिक रिवीजन याचिका से जुड़ा है, जिसमें पुलिस विभाग के चार अधिकारियों ने 21 नवंबर 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें विशेष न्यायालय ने एक परिवाद पर संज्ञान लेते हुए पुलिस अधीक्षक श्रीगंगानगर को उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए थे.

शिकायत प्रतिशोध की भावना से प्रेरित

वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद पुरोहित एवं उनके सहयोगी मंयक रॉय ने बताया कि परिवादी टेकचंद ने आरोप लगाया था कि संबंधित अधिकारियों ने एक मामले की जांच में अनियमितताएं कीं और उसके साथ दुर्व्यवहार किया. हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि यह विवाद पहले से दर्ज एफआईआर और उनके प्रतिशोध में की गई कार्रवाइयों से जुड़ा हुआ है. रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ कि परिवादी द्वारा दर्ज कराई गई एक एफआईआर में जांच के बाद पुलिस ने नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट पेश की थी, जिससे यह संकेत मिलता है कि शिकायत प्रतिशोध की भावना से प्रेरित हो सकती है.

कोर्ट ने क्या की टिप्पणी

न्यायालय ने अपने फैसले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 223 का विशेष उल्लेख किया और कहा कि यह प्रावधान सरकारी कर्मचारियों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाने के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच प्रदान करता है. इस धारा के तहत यह अनिवार्य है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से संबंधित आरोप लगाए जाते हैं, तो उसे पहले अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए और उसके वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट प्राप्त की जाए. कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने इन अनिवार्य प्रावधानों की अनदेखी करते हुए यांत्रिक तरीके से एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे दिया, जो न्यायिक विवेक के अभाव को दर्शाता है. आदेश में यह भी कहा गया कि मजिस्ट्रेट को शिकायत की गंभीरता, पृष्ठभूमि और तथ्यों का समुचित परीक्षण करना चाहिए था, विशेषकर तब जब मामला पहले से चल रहे विवादों और प्रतिशोध की संभावनाओं से जुड़ा हो.

शिकायत की नए सिरे से जांच करें

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 175(3) के तहत एफआईआर दर्ज करने के आदेश देने की शक्ति का उपयोग सोच-समझकर और विवेकपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए, न कि औपचारिकता के रूप में. न्यायालय ने कहा कि कानून यह अनुमति नहीं देता कि केवल आरोपों के आधार पर बिना प्रारंभिक जांच और सुनवाई के आपराधिक प्रक्रिया शुरू कर दी जाए. हाई कोर्ट ने 21 नवंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए मामले को पुनः निचली अदालत को भेज दिया और निर्देश दिया कि वह शिकायत की नए सिरे से जांच करें. साथ ही यह सुनिश्चित करे कि संबंधित सरकारी अधिकारियों को सुनवाई का अवसर दिया जाए और विधि अनुसार आवश्यक रिपोर्ट प्राप्त कर उचित निर्णय लिया जाए.

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