Ranthambore: रणथंभौर टाइगर रिजर्व में पैंथर का कुनबा बढ़ा, पर्यटकों के लिए बढ़ा रोमांच

रणथंभौर टाइगर रिजर्व में टाइगर सफारी के लिए आ रहे सैलानियों को लेपर्ड भी दिख रहे हैं. इससे यहां का पर्यटन और भी ख़ास हो जाता है.

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Ranthambore National Park: सवाई माधोपुर स्थित प्रदेश का सबसे बड़ा रणथंभौर टाईगर रिजर्व बाघ संरक्षण के चलते अपनी खास पहचना रखता है. अब यहां लेपर्ड का कुनबा भी बढ़ता जा रहा है. यही वजह है कि टाइगर सफारी के लिए जंगल भ्रमण पर जाने वाले सैलानियों को बाघ के साथ लेपर्ड की भी खूब साइटिंग हो रही है. माना जाता है कि लेपर्ड काफी शर्मीले स्वभाव का वन्यजीव होता है और बाघों के इलाके में बहुत कम दिखाई देता है. ऐसे में अगर सैलानियों को टाइगर सफारी के दौरान लेपर्ड की साइटिंग हो जाती है तो सैलानी गदगद हो उठते है. इन दिनों रणथंभौर में कुछ ऐसा ही हो रहा है. 

साल 2024 में थे 167 लेपर्ड

वन्यजीव विशेषज्ञ धर्मेंद्र खांडल का कहना है कि रणथंभौर के तकरीबन सभी जोनों में लेपर्ड की उपलब्धता है. टाइगर सफारी के दौरान जब सैलानियों को लेपर्ड नजर आता है तो सैलानी खासा खुश नजर आते हैं. धर्मेंद्र खांडल के मुताबिक, रणथंभौर में साल 2024 की गणना के मुताबिक 167 लेपर्ड थे और इनकी संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है. वैसे तो रणथंभौर के सभी जोन में लेपर्ड की मौजूदगी है, लेकिन विशेषकर जोन-1 और 6 में सर्वाधिक लेपर्ड हैं. वहीं, मुख्य जोन के अलावा रणथंभौर के पैराफेरी वाले बाहरी इलाकों व नॉन ट्यूरिज़्म जोन में भी बड़ी संख्या में लेपर्ड हैं.

बाघों की संख्या से दोगुने लेपर्ड

एक्सपर्ट के मुताबिक, रणथंभौर में बाघों के साथ ही लेपर्ड के संरक्षण का भी अच्छे से काम हो रहा है. वन विभाग और पर्यटन क्षेत्र से जुड़े गाइड और वाहन चालक लेपर्ड के संरक्षण को लेकर सतर्क भी है. सरकार को भी रणथंभौर में लेपर्ड की बढ़ती संख्या को लेकर लेपर्ड के संरक्षण को लेकर ठोस कदम उठाना चाहिए. 

रणथंभौर का जितना क्षेत्रफल है, उसमें से आधे क्षेत्र में ही बाघ दिखते हैं. लेकिन लेपर्ड की मौजूदगी पूरे रणथंभौर में पाई जाती है. रणथंभौर में बाघों की संख्या से दोगुनी संख्या में लेपर्ड हैं, जो रणथंभौर के पर्यटन को और भी ख़ास बना देता है.

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बढ़ रही हैं मानव संघर्ष की घटनाएं 

रणथंभौर के डीएफओ मानस सिंह का कहना है कि बाघ अपने इलाके में किसी अन्य ताकतवर वन्यजीव की मौजूदगी सहन नहीं करता. इसके चलते ऐसे इलाकों में लेपर्ड कम ही नजर आता है. बाहरी इलाकों में लेपर्ड की मौजूदगी की वजह से ही कई बार वो इंसानी बस्ती में भी आ जाते है और मानव संघर्ष की घटनाएं बढ़ जाती है.  

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