इस साल गणतंत्र दिवस का मुख्य थीम ‘‘वंदे मातरम के 150 वर्ष'' है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू कर्तव्य पथ के लिए रवाना हुईं. उनके साथ यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन भी मौजूद थीं. राष्ट्रपति ने शपथ ग्रहण समारोह के लिए राष्ट्रपति भवन से संसद तक जाने के लिए इस बग्गी का इस्तेमाल किया. इस शाही बग्घी का इतिहास ब्रिटिश शासन काल से जुड़ा है. हालांकि आजादी के कुछ वर्षों बाद, सुरक्षा की दृष्टि से बंद कर दिया गया. पारंपरिक बग्घी की जगह जल्द ही बुलेटप्रूफ कारों ने ले ली. ऐतिहासिक बग्घी की 2014 में वापसी हुई, जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी बीटिंग रिट्रीट समारोह में भाग लेने के लिए इसमें सवार होकर पहुंचे.
वायसराय करते थे उपयोग
सुनहरे रंग की शाही बग्घी में लाल मखमल और भारत का राष्ट्रीय चिह्न अशोक चक्र भी अंकित है. इसका उपयोग मूल रूप से ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वायसराय करते थे. इसी में बैठकर वायसराय औपचारिक समारोहों में पहुंचते थे.
भारत-पाकिस्तान के बीच लगी थी होड़
जब औपनिवेशिक शासन समाप्त हुआ तो भारत और पाकिस्तान दोनों ही उस आलीशान बग्गी के लिए हौड़ करने लगे. यह तय करने के लिए कि कौन सा देश बग्घी रखेगा, दोनों देशों ने एक अनोखा समाधान निकाला. दोनों पड़ोसी देशों ने फैसला भाग्य पर छोड़ दिया और सिक्का उछालने का विकल्प चुना. भारत के कर्नल ठाकुर गोविंद सिंह और पाकिस्तान के साहबजादा याकूब खान ने सिक्का उछाला. तब सिक्का भारत के पक्ष में रहा और कर्नल सिंह ने भारत के लिए बग्घी जीत ली.
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