साध्वी प्रेम बाईसा ने कब और किसे देखकर लिया था संन्यास, क्या आप जानते हैं जवाब?

Jodhpur News: उनके प्रवचनों में धर्म के प्रोत्साहन के साथ ही नैतिकता पर बल रहता था. उन्होंने ग्रामीण इलाकों में नशामुक्ति, नारी सशक्तिकरण और पारिवारिक मूल्यों पर जोर दिया. 

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साध्वी प्रेम बाईसा की मौत के बाद आश्रम के बाहर सन्नाटा छाया हुआ है.

Sadhvi prem baisa death: राजस्थान की प्रसिद्ध कथावाचक बाल साध्वी प्रेम बाईसा की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. अनुयायी उनकी रहस्यमय मौत के सच को सामने लाने की मांग पर अड़े हुए है. वहीं, उनके पाल उदित आश्रम के बाहर मौत के बाद से ही सन्नाटा है. पुलिस ने इस घटना के बाद उनके आश्रम को सीज कर दिया है. बाड़मेर जिले के परेऊ गांव में जन्मी साध्वी प्रेम बाईसा बचपन से ही अध्यात्म की ओर झुकाव रखती थीं. उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सुधार और ईश्वरीय भक्ति को समर्पित कर रखा था.

प्रवचन में परिवार-मूल्यों पर रहता था जोर 

वह महंत वीरमनाथ की शिष्या थीं और वह गुरु महंत विरमनाथ की बेटी थीं. वह अपने पिता के साथ ही आश्रम में रहकर धार्मिक कार्यों में काफी सक्रिय थीं. साध्वी के बाल्यावस्था में उनकी माता का निधन हो गया था. इसके बाद पिता से प्रेरित होकर वह एक बाल साध्वी के रूप में पहचानी जाने लगीं. उनके प्रवचनों में धर्म के प्रोत्साहन के साथ ही नैतिकता ओर परिवार-मूल्यों पर बल दिया जाता था. 

आश्रम में हर दिन जुटती थी भारी भीड़

उन्होंने प्रण लिया था कि उनका पूरा जीवन भक्ति, सेवा और समाज सुधार को समर्पित होगा.  जोधपुर के पाल रोड स्थित आरती नगर में कुटीर आश्रम में प्रतिदिन जहां बड़ी संख्या में उनके भक्त उनके दर्शन करने के लिए आते थे, लेकिन उनकी मौत के बाद से ही इस आश्रम के बाहर सन्नाटा पसरा पड़ा है.

ग्रामीण इलाकों में फैलाई जागरूकता

उनकी पहचान एक कथा वाचिका और सुरीली भजन गायिका के रूप में थी. वह केवल भजन तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने ग्रामीण इलाकों में नशामुक्ति, नारी सशक्तिकरण और पारिवारिक मूल्यों पर जोर दिया. 

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