Sanchore News: सांचौर के डावल में जीवंत है रियासतकालीन होली परंपरा, धुलंडी पर उमड़ा आस्था और उल्लास का सैलाब

बिश्नोई समाज के आराध्य जाम्भोजी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है. इसी धार्मिक मान्यता के चलते समाज अपने आराध्य के स्मरण, सत्संग और सामूहिक आयोजन के माध्यम से पर्व मनाता है.

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Rajasthan News: रंग, उमंग और आस्था के संगम का अद्भुत दृश्य इस बार भी डावल गांव में देखने को मिला, जहां रियासतकाल से चली आ रही होली की ऐतिहासिक परंपरा आज भी उसी गरिमा और अनुशासन के साथ निभाई जा रही है. धुलंडी के अवसर पर गांव में ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि मुख्य चौक से लेकर गलियों तक उत्सव का रंग छा गया.  प्रातःकाल बिश्नोई समाज के श्रद्धालु सामूहिक रूप से डावल स्थित जम्भेश्वर चौकी पर ‘पाहल' लेकर पहुंचे. आराध्य के प्रति श्रद्धा अर्पित कर परंपरा का निर्वहन किया गया. धार्मिक अनुष्ठान के बाद पूरे गांव में रंगों की बौछार शुरू हो गई. डीजे की धुन पर युवाओं ने उत्साहपूर्वक नृत्य किया और एक-दूसरे को रंग लगाकर बधाइयां दीं.

खेलकूद से गूंजा मुख्य चौक

दोपहर बाद गांव के मुख्य चौक में पारंपरिक खेलकूद प्रतियोगिताओं का आयोजन हुआ. कबड्डी, रस्साकशी और बोरी रेस में युवाओं और बच्चों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. विजेताओं को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया. खेलों के दौरान ग्रामीणों की भारी भीड़ उमड़ी रही, जिससे माहौल उत्साहपूर्ण बना रहा. महिलाओं ने फागुन गीत गाकर उत्सव को सांस्कृतिक रंग दिया. पारंपरिक ‘लूर' नृत्य की प्रस्तुति में सैकड़ों महिलाएं शामिल हुईं. ढोलक की थाप और गीतों की मधुर धुन पर झूमती महिलाओं ने पूरे वातावरण को उल्लासमय बना दिया.

होलिका दहन से दूरी, प्रह्लाद में आस्था

ग्रामीणों ने बताया कि बिश्नोई समाज होलिका दहन के दर्शन नहीं करता और उसमें सम्मिलित नहीं होता. समाज स्वयं को ‘प्रह्लाद पंथी' मानता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार होलिका ने भक्त प्रह्लाद को अग्नि में जलाने का प्रयास किया था, किंतु ईश्वर कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका दहन हो गई. इसी आस्था के कारण समाज होलिका दहन से दूरी रखते हुए भगवान प्रह्लाद का स्मरण करता है.

बिश्नोई समाज के आराध्य जाम्भोजी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है. इसी धार्मिक मान्यता के चलते समाज अपने आराध्य के स्मरण, सत्संग और सामूहिक आयोजन के माध्यम से पर्व मनाता है.

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परंपरा के संरक्षण का संकल्प

ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा रियासतकाल से लगातार चली आ रही है और नई पीढ़ी भी इसे पूरे अनुशासन और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रही है. सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था का यह अनूठा संगम डावल की पहचान बन चुका है.

इस अवसर पर सरपंच प्रतिनिधि बाबूलाल साहू, पूर्व उपसरपंच आदुलाल, भूपेंद्र पुनिया, अनिल पंवार, मांगीलाल जानी, गणपत वकील, प्रतापचंद सियाक, मालाराम मारसा, भगराज सोनी, पूर्व सरपंच आसुराम, गिरधारीसिंह, डॉ. महिपाल जानी तथा पुलिस विभाग से एएसआई आसाराम जाट और हेड कांस्टेबल रामलाल सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे. रंगों के इस महापर्व पर डावल ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब समाज उन्हें आस्था, अनुशासन और सामूहिक भागीदारी के साथ निभाता है.

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