मुकुंदरा में बाघों को बसाने के लिए हुए 3 मुश्किल प्रयोग, तीसरा कनकटी पर हुआ था

दक्षिण पूर्व राजस्थान में बसा मुकुंदरा टाइगर रिजर्व ने बाघ संरक्षण की सफलता से वाइल्डलाइफ टूरिज्म को नई रफ्तार दी है और इसे देशभर के लिए उदाहरण बताया जा रहा है.

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मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में कनकटी को लेकर किया गया प्रयोग कारगर रहा
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राजस्थान का मुकुंदरा टाइगर रिजर्व अब सिर्फ एक संरक्षित वन क्षेत्र नहीं, बल्कि देश में बाघ संरक्षण की नई उम्मीद बनकर उभरा है. यहां बाघों को  बसाने के तीन ऐसे कठिन प्रयोग सफल हुए हैं, जिन्हें देश में पहली बार इस स्तर पर अंजाम दिया गया. अनाथ शावक को जंगल के लिए तैयार करना, दूसरे राज्य से बाघिन का सफल ट्रांसलोकेशन और हिंसक बाघिन के स्वभाव में बदलाव. इन तीनों सफलताओं ने मुकुंदरा को देश के प्रमुख टाइगर रिजर्व की कतार में ला खड़ा किया है. बढ़ती बाघों की संख्या अब यहां वाइल्डलाइफ टूरिज्म की नई संभावनाओं के दरवाजे भी खोल रही है. मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में इस समय बाघों की संख्या बढ़कर सात हो चुकी है. इनमें दो नर और चार मादा बाघों का संतुलित अनुपात भविष्य में प्राकृतिक प्रजनन की मजबूत संभावना दिखा रहा है. वन विभाग को उम्मीद है कि सितंबर तक यहां बाघों की संख्या में और इजाफा हो सकता है. 

तीन प्रयोग

कोटा क्षेत्र के मुख्य वन संरक्षक सुगना राम ने बताया कि मुकुंदरा की पहली बड़ी सफलता रही रणथंभौर की बाघिन टी-114 के अनाथ शावक का पुनर्वास. इस शावक को कोटा के अभेड़ा रेस्क्यू सेंटर में करीब 22 महीने तक इंसानों से दूर रखकर प्राकृतिक तरीके से शिकार करना सिखाया गया. 11 दिसंबर 2024 को उसे मुकुंदरा के जंगल में छोड़ा गया. आज एमटी-7 पूरी तरह स्वतंत्र होकर जंगल में सफलतापूर्वक शिकार कर रही है. यह देश में टाइगर री-वाइल्डिंग का सफल उदाहरण माना जा रहा है.

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मुकुंदरा टाइगर रिजर्व 52 वर्ग किलोमीटर में फैला है
Photo Credit: NDTV

दूसरा बड़ा प्रयोग था इंटर-स्टेट ट्रांसलोकेशन. 28 फरवरी 2026 को मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से एक बाघिन को मुकुंदरा लाया गया. एमटी-10 नाम की इस बाघिन ने महज पांच महीनों में रावतभाटा रेंज में अपनी टेरिटरी स्थापित कर ली. इससे साबित हुआ कि मुकुंदरा का जंगल नए बाघों के लिए पूरी तरह अनुकूल है. 

कनकटी पर प्रयोग

तीसरी और सबसे चुनौतीपूर्ण सफलता रही रणथंभौर की चर्चित बाघिन 'कनकटी' के व्यवहार में बदलाव. दो लोगों पर हमला करने के बाद जून 2025 में उसे मुकुंदरा लाया गया था. शुरुआत में उसके आक्रामक स्वभाव को लेकर चिंता थी, लेकिन शांत वातावरण और बेहतर प्रबंधन के चलते उसका व्यवहार पूरी तरह बदल गया. अब यही बाघिन सफारी में आने वाले पर्यटकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण बन गई है.

पूरे देश के लिए बना मॉडल

सुगना राम ने बताया कि मुकुंदरा की सफलता के पीछे यहां की प्राकृतिक परिस्थितियां भी अहम हैं. विशाल ग्रासलैंड, जंगल के बीच बहती चंबल नदी और आमझर, आहू, पार्वती जैसी बारहमासी नदियां बाघों और उनके शिकार प्रजातियों के लिए आदर्श वातावरण तैयार करती हैं. 52 वर्ग किलोमीटर का विशाल एनक्लोजर अब देशभर के लिए मॉडल बन चुका है. कुनो और गांधीसागर जैसे चीता प्रोजेक्ट्स में भी इसी तर्ज पर एनक्लोजर विकसित किए जा रहे हैं. 

एक समय जिस मुकुंदरा में बाघों को बसाना बड़ी चुनौती माना जाता था, वही आज देश में टाइगर रिवाइवल की सफलता की कहानी लिख रहा है. संरक्षण के इन सफल प्रयोगों ने न सिर्फ जंगल को नई जिंदगी दी है, बल्कि कोटा और हाड़ौती में वाइल्डलाइफ टूरिज्म की अपार संभावनाएं भी पैदा कर दी हैं. आने वाले वर्षों में मुकुंदरा पर्यटकों के लिए नया आकर्षण और देश के लिए संरक्षण का प्रेरक मॉडल बन सकता है.

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