'एंबुलेंस के पैसे नहीं हैं', बेटी का शव हाथों में लिए फूट-फूटकर रोए माता-पिता, लोगों ने चंदा इकट्ठा कर की मदद

राजस्थान के टोंक में एक गरीब दंपति को अपनी मृत बेटी का शव घर ले जाने के लिए एंबुलेंस नहीं मिली. जब अस्पताल प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए, तो आम लोगों ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया और चंदा इकट्ठा कर एंबुलेंस का इंतजाम किया.

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टोंक अस्पताल: शव ले जाने को पैसे नहीं, तो नहीं मिली एंबुलेंस.

Rajasthan News: राजस्थान के टोंक जिले से एक बेहद ही हृदय विदारक घटना सामने आई है, जिसने सरकारी व्यवस्थाओं पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. मध्य प्रदेश के एक गरीब दंपति को अपनी मृत बेटी का शव घर ले जाने के लिए घंटों तक एक अस्पताल की सीढ़ियों पर रोते-बिलखते बैठना पड़ा. उनके पास एंबुलेंस का किराया देने तक के पैसे नहीं थे. अंत में, जब अस्पताल प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली, तो स्थानीय लोगों ने इंसानियत का परिचय देते हुए चंदा इकट्ठा कर एंबुलेंस का इंतजाम किया.

रामदेवरा जाते समय बिगड़ी तबीयत

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के रहने वाले जुगराज सहरिया अपनी पत्नी के साथ ढाई साल की बेटी रिया को लेकर राजस्थान के रूणीचा धाम (रामदेवरा) जा रहे थे. रास्ते में उनकी बेटी की तबीयत अचानक बिगड़ गई. वे उसे सबसे पहले उनियारा के सरकारी अस्पताल ले गए. वहां से बच्ची को टोंक के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, सआदत अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया.

हालांकि, बच्ची को बचाया नहीं जा सका और टोंक के अस्पताल में उसकी मौत हो गई. यह खबर सुनते ही मां-बाप पर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. वे अपनी बेटी के शव को लेकर अस्पताल के बाहर की सीढ़ियों पर बैठ गए और फूट-फूटकर रोने लगे. उनकी एक ही गुहार थी कि किसी तरह उन्हें अपनी बच्ची का शव लेकर अपने गांव वापस जाने के लिए एक एंबुलेंस मिल जाए. उन्होंने बताया कि उनके पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वे एंबुलेंस का किराया दे सकें.

सरकारी व्यवस्था हुई फेल

पीड़ित पिता जुगराज सहरिया ने बताया कि उन्होंने अस्पताल प्रशासन से मदद मांगी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. अस्पताल की तरफ से उन्हें कोई सरकारी एंबुलेंस नहीं दी गई. सआदत अस्पताल के पीएमओ हनुमान प्रसाद बैरवा ने भी इस बात को स्वीकार करते हुए तर्क दिया कि सरकारी नियमों के अनुसार, अस्पताल में शव को ले जाने के लिए एंबुलेंस की सुविधा उपलब्ध नहीं है. उन्होंने बताया कि बच्ची को बचाने की पूरी कोशिश की गई थी, और मौत से कुछ मिनट पहले ही उसे जयपुर के लिए रेफर किया गया था.

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अस्पताल के इस रवैये से वहां मौजूद लोग भड़क गए. उन्होंने अस्पताल प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और इस अमानवीय व्यवहार की निंदा की.

इंसानियत ने दिखाई राह

जब सरकारी मदद नहीं मिली, तो लोगों ने खुद ही आगे बढ़कर मदद का बीड़ा उठाया. स्थानीय लोगों ने मिलकर तुरंत चंदा इकट्ठा करना शुरू किया. उनके साथ अस्पताल के कुछ स्टाफ भी मदद के लिए आगे आए. देखते ही देखते लोगों ने एंबुलेंस का इंतजाम कर दिया और किराया भी खुद ही दिया. यही नहीं, लोगों ने दंपति को रास्ते के खर्च के लिए कुछ अतिरिक्त पैसे भी दिए, ताकि उन्हें आगे किसी तरह की परेशानी न हो. इसके बाद उस एंबुलेंस में वे अपनी बेटी का शव लेकर वापस अपने गांव के लिए रवाना हुए.

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