राजस्थान की पहली 'पूर्ण जैविक ग्राम पंचायत' का दावा निकला फर्जी? NDTV की ग्राउंड रिपोर्ट में खुली दावों की पोल

कोटपूतली-बहरोड़ की 'बामनवास कांकड़' ग्राम पंचायत प्रदेश की पहली पूर्ण रूप से जैविक पंचायत बन गई. इसे जानने के लिए NDTV की टीम ने ग्राउंड जीरो पर जाकर इस 'तथ्य' की पड़ताल की, तो वहां की तस्वीर इन दावों के बिल्कुल उलट और चौंकाने वाली निकली.

विज्ञापन
Read Time: 4 mins
ऑर्गेनिक पंचायत रियलिटी चेक
ऑर्गेनिक पंचायत रियलिटी चेक

Organic Panchayat Reality Check: राजस्थान सहित पूरे देश में इन दिनों एक दावा तेजी से वायरल हो रहा कि कोटपूतली-बहरोड़ की 'बामनवास कांकड़' ग्राम पंचायत प्रदेश की पहली पूर्ण रूप से 'जैविक पंचायत' बन गई है. यह सूचना इस कदर फैली कि सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के सामान्य ज्ञान (GK) का हिस्सा बन गई. किताबों में पढ़ाया जाने लगा कि प्रदेश की पहली पूर्ण जैविक पंचायत 'बामनवास कांकड़' है. लेकिन, क्या इस दावे में वाकई कोई सच्चाई है? इसे जानने के लिए NDTV की टीम ने ग्राउंड जीरो पर जाकर इस 'तथ्य' की पड़ताल की, तो वहां की तस्वीर इन दावों के बिल्कुल उलट और चौंकाने वाली निकली.

जैविक खेती नहीं अभी खाद का ही खेतों में करते है प्रयोग

इस वायरल हो रह दावे की सच्चाई को लेकर जब ग्राम पंचायत के लोगों से बात की तो उन्होने  बताया कि "जैविक" नाम ही उन्होंने पहली बार सुना है. यहां किसान अपने-अपने खेतों में यूरिया,डीएपी और केमिकल का इस्तेमाल कर रहे हैं. जिसके लिए उन्हें लंबी- लंबी लाइनों में लगना पड़ता है इसलिए कई बार मजबूरी में 200 रुपए एक्स्ट्रा दे कर ब्लैक में खरीद कर खेतों में डालते है.

कृषि विभाग और NGO के दावों में बड़ा अंतर

कृषि अधिकारियों ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है, वहीं प्रोजेक्ट चला रहे NGO ने भी स्वीकार किया है कि यह केवल एक शुरुआत है, न कि अंतिम परिणाम जिसे लेकर कृषि अधिकारी महेंद्र जैन और लीलाराम ने स्पष्ट किया कि COFED नाम के NGO ने ग्रामीणों को केवल जैविक खेती की शपथ दिलवाई है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इन गांवों में फिलहाल जैविक खेती जैसा कुछ नहीं है. इसे 'पूर्ण रूप से जैविक पंचायत' कहना एकदम गलत और भ्रामक है.

 NGO का तकनीकी स्पष्टीकरण

विवाद बढ़ता देख NGO के प्रतिनिधि जितेंद्र सिंह और करणी सिंह ने तकनीकी बचाव करते हुए बताया कि उनका दावा 100% पंजीकरण और शपथ पर आधारित है, न कि उत्पादन पर. पंचायत को अभी सिर्फ 'पीजीएस ग्रीन' का स्टेटस मिला है. इसका मतलब है कि किसान अभी जैविक खेती की प्रक्रिया में दाखिल हुए हैं. पूरी तरह जैविक होने के लिए मिट्टी की रिपोर्ट और लगातार तीन साल की कड़ी निगरानी की ज़रूरत होती है. करणी सिंह ने माना कि '100% का दावा' पूर्णता के लिए नहीं, बल्कि 2 जनवरी को सभी किसानों द्वारा एक साथ ली गई शपथ के लिए था.

Advertisement

जब इसकी और पड़ताल करने के लिए बामनवास कांकड़ के खेतों में कदम रखा, तो वहां  खेतों में यूरिया की बोरियों  मिली. राजस्थान की पहली 'पूर्ण जैविक पंचायत' की पोल खुद यहां के किसान खोल रहे हैं.

बोर्ड लगा दिए, पर फसल तो यूरिया से ही लहलहा रही है

बैरावस गांव के ओमप्रकाश ने बताया कि हम गेहूं में  यूरिया डालते हैं. कुछ लोग आए, घर के बाहर बोर्ड टांग गए और कह गए कि दूध अब डेयरी में ही देना. वहीं, इसी गांव के अमन ने बोर्ड को लेकर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि हमें तो मुफ्त भैंस और दूध के अच्छे दाम का लालच देकर ये बोर्ड लगाए गए थे, लेकिन मिला कुछ नहीं. खेती तो आज भी यूरिया और डीएपी के भरोसे ही है.

Advertisement

गांव के अमरचंद और उम्मेद गुर्जर बताते हैं कि टीनशेड, पैसे और सुविधाओं के सपने दिखाकर उनके घर के बाहर बोर्ड लगा दिया गया जबकि वे आज भी कीटनाशकों का इस्तेमाल कर रहे हैं. अरावली पहाड़ियों के बीच बसे 'राह का माला' का माला में खेती बहुत कम होती है क्योंकि करीब 2000 फीट की ऊंचाई पर गाड़ी से पहुंचना मुश्किल है, लेकिन इसी गांव के राजेश कहते हैं कि हम यूरिया डालते हैं, जिसके बिना खेती मुमकिन नहीं है. हम बाजरा, मक्का और सरसों उगाते हैं. जिसमें NGOs से कुछ मदद मिली है. किसानों ने बताया कि NGO द्वारा किया जा रहा दावा सरासर गलत हैं.  

यह भी पढ़ें; Rajasthan: KBC में जीती राशि से इस गांव की सरपंच ने दिया बच्चों को अनोखा गिफ्ट, सरकारी स्कूल को बनाया हाईटेक प्ले स्कूल

Advertisement