Tivari Monsoon Tradition: जोधपुर के मारवाड़ में मानसून का इंतजार सिर्फ मौसम विभाग की भविष्यवाणियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां सदियों पुरानी लोक परंपराएं आज भी लोगों की आस्था और उम्मीदों का आधार बनी हुई हैं. शुक्रवार को तिंवरी क्षेत्र में हाली अमावस्या के अवसर पर करीब 200 वर्ष पुरानी अनूठी परंपरा एक बार फिर जीवंत हुई, जब घड़ों के जरिए मानसून का आकलन किया गया.
तिंवरी में सुबह होते ही गांव के कुम्हार के घर ग्रामीणों और किसानों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी. हर किसी की नजर चाक पर घूमती मिट्टी पर टिकी थी, जहां एक-एक कर पांच छोटे घड़े आकार ले रहे थे.
क्या है परंपरा
घड़ों के फूटने की गणना से तय होती है मानसून की गणना
इस मानसून की गणना को लेकर वर्ष के आकलन के दौरान ज्येष्ठ माह का घड़ा करीब 9 मिनट बाद फूटा, जिसे 27 दिनों के हिसाब से ज्येष्ठ में कमजोर बारिश का संकेत माना गया. वहीं आषाढ़ का घड़ा करीब साढ़े चार मिनट में फूटा, जिससे 27 जून से 5 जुलाई के बीच मानसून की दस्तक का संकेत मिला. श्रावण और भाद्रपद के घड़ों से भी अच्छे संकेत मिले, जिससे किसानों के चेहरों पर संतोष और खुशी साफ दिखाई दी.
अच्छी बारिश की कामना की
पूरी प्रक्रिया संपन्न होने के बाद कुम्हार के चाक, भगवान शंकर, गणेश और आकाश की पूजा की गई. कुम्हार को किसान का प्रतीक मानते हुए उसे घड़ों का पानी पांच बार पिलाया गया. साथ ही अच्छी बारिश की कामना के लिए इंद्र देव को विशेष भोग लगाया गया. जिसमें एक दिन पहले भिगोए गए बाजरे से सुबह बनी खींच खिलाई. साथ ही गुड़-आटे से गलवानी तैयार कर प्रसाद के रुप में बांटी गई.
वैज्ञानिक आधार नहीं, मन की आस्था है
इस परंपरा का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, लेकिन बुजुर्गों और किसानों का मानना है कि कई बार यह आकलन वास्तविक मानसून के काफी करीब साबित हुआ है. यही कारण है कि तिंवरी में यह परंपरा आज भी जीवित है और हर वर्ष पूरे विश्वास, आस्था और उत्साह के साथ निभाई जाती है.