पाकिस्तान के कारण राजस्थान स्थित पक्षियों के स्वर्ग में नहीं आ रहे साइबेरियन सारस, चीन जा रहे

आखिरी बार साल 2001 में सारस का एक जोड़ा यहां देखा गया था. लेकिन शायद अब साइबेरियन सारस केवलादेव उद्यान की ओर आने वाला रास्ता ही बदल लिया है.

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साइबेरियन सारस

Keoladeo National Park Siberian Crane: राजस्थान के भरतपुर में स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान पक्षियों के स्वर्ग के नाम से जाना जाता है. वहीं साइबेरियन सारस का जमावड़ा इस स्वर्ग में खूब लगा करता था. लेकिन इस स्वर्ग में 24-25 साल से साइबेरियन सारस नजर नहीं आए हैं. बताया जाता है कि आखिरी बार साल 2001 में सारस का एक जोड़ा यहां देखा गया था. लेकिन शायद अब साइबेरियन सारस केवलादेव उद्यान की ओर आने वाला रास्ता ही बदल लिया है. हालांकि सारस के रास्ता बदल लेने का एक महत्वपूर्ण कारण है. इस वजह से वह अब यहां नहीं आते हैं.

साइबेरियन सारस का भारत नहीं पहुंचने का सबसे बड़ा कारण है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान में इनका होने वाला शिकार, सारस के रास्ते में आने वाला देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान में  इनका बड़े तादाद में शिकार होने लगा था. इस वजह से सारसों ने रास्ता बदल लिया और यह अब चीन की ओर जाने लगे और भारत का रास्ता भूल गए. शिकार के कारण उन्होंने अपना रास्ता बदल दिया और चाइना जाने लगे. 

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पहले सारस और सैलानी दोनों पहुंचते थे भरतपुर

पहले ये पक्षी साइबेरिया से कई देशों की यात्रा कर भरतपुर पहुंचते थे. यहां  इनके लिए अच्छा वातावरण और भरपूर भोजन था. जिसके लिए सारस हर साल बड़ी तादाद में यहां पहुंचते थे. पक्षी प्रेमी और सैलानी भी उन्हें देखने के लिए विशेष रूप से यहां पहुंचते थे. लेकिन अब सब बदल गया है.

भोजन और मनोरंजन के लिए होता था शिकार

केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान गाइड के जी लवानिया ने बताया कि 2001 में साइबेरियन सारस का एक जोड़ा नजर आया था. उसके बाद साइबेरियन सारस 24-25 साल बाद से केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में नजर नहीं आए. यहां नहीं आने की मुख्य वजह सामने आई है कि जब साइबेरियन सारस साइबेरिया से उड़कर  रूस, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होते हुए भरतपुर तक पहुंचते थे. लेकिन पाकिस्तान और अफगानिस्तान में इनका भजन और मनोरंजन के लिए शिकार शुरू कर दिया गया इसी के चलते इन्होंने अपना रूट बदल दिया.

साइबेरियन क्रेन की तीन पॉपुलेशन हैं. पहली सेंट्रल पॉपुलेशन, दूसरी वेस्टर्न पॉपुलेशन और तीसरी ईस्टर्न पॉपुलेशन. इसमें से सेंट्रल पॉपुलेशन भरतपुर आया करती थी. ऐसे में सेंट्रल पॉपुलेशन की संख्या हर साल कम होती गई. अब ये 5 हजार के करीब ही बचे हैं.

ये पक्षी जमीन से 30 हजार फीट (लगभग 1000 मीटर) ऊंचा उड़ते हैं। इनकी उड़ने की रफ्तार 40 किमी प्रति घंटा के हिसाब से होती है। ऐसे में ये पक्षी करीब एक महीने में यहां पहुंच पाते थे।करीब तीन माह यहां रुकते थे.

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