Rajasthan Diwas 2026: कोरा कागज हाथ में था, शर्तें लिखने की आजादी थी... जानें कैसे जैसलमेर के एक फैसले से भारत का हिस्सा बने जोधपुर-बीकानेर

राजस्थान दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उस राष्ट्रभक्ति की याद है जिसने पाकिस्तान के मंसूबों को मिट्टी में मिला दिया था. जब जिन्ना ने जैसलमेर को पाकिस्तान में मिलाने के लिए 'कोरा कागज' और 'मनचाही शर्तें' ऑफर की थीं, तब महारावल के एक फैसले ने न केवल जैसलमेर, बल्कि जोधपुर और बीकानेर को भी भारत का अटूट हिस्सा बनाए रखा. पढ़ें जैसाण के शौर्य की यह विशेष रिपोर्ट...

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राजस्थान दिवस: जिन्ना का प्रस्ताव ठुकराया, भारत में दमका जैसाण, महारावल के एक फैसले ने तय की राजस्थान की तकदीर
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Rajasthan Diwas 19 March: राजस्थान दिवस के अवसर पर आज हम उस ऐतिहासिक फैसले को याद कर रहे हैं जिसने 'वृहद राजस्थान' की नींव रखी. यह कहानी सीमावर्ती जैसलमेर रियासत की है, जिसके महारावलों ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के प्रलोभन को ठुकराकर भारत की तकदीर लिखी थी.

जिन्ना ने भेजा था 'कोरा कागज'

इतिहास के जानकार मीठालाल व्यास और मनीष रामदेव बताते हैं कि 1948 में आजादी के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद अली जिन्ना ने जैसलमेर को अपने साथ मिलाने के लिए हर संभव दांव-पेच लड़ाए थे. जिन्ना ने अपने मंत्री हासम सिलावटा को एक विशेष वायुयान से जैसलमेर भेजा. हासम ने महारावल जवाहर सिंह से मुलाकात कर जिन्ना का वह प्रस्ताव रखा जिसने इतिहास बदल दिया होता. हासम ने महारावल को एक कोरा कागज थमाया, जिस पर जिन्ना के हस्ताक्षर पहले से मौजूद थे. संदेश साफ था- 'महारावल अपनी मनचाही शर्तें लिख दें, बस जैसलमेर का विलय पाकिस्तान में कर दें.'

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महारावल से मिली 'फटकार'

महारावल जवाहर सिंह बिना विचलित हुए हासम को अपने दीवान से मिलने को कहा. दीवान ने न केवल इस प्रस्ताव को दरकिनार किया, बल्कि बिना अनुमति जैसलमेर की सीमा में विमान लाने के लिए हासम को कड़ी फटकार लगाई. हासम को खाली हाथ लौटना पड़ा.

'हम भारत के साथ खड़े रहेंगे'

जिन्ना ने हार नहीं मानी और दिल्ली में महारावल जवाहर सिंह के पुत्र महारावल गिरधर सिंह के सामने फिर वही प्रस्ताव रखा. यह जैसलमेर के लिए परीक्षा की घड़ी थी. तब जवाब साफ था- जैसलमेर भारत के साथ खड़ा रहेगा. महारावल गिरधर सिंह ने दोटूक शब्दों में कहा, 'यदि पाकिस्तान और भारत के बीच युद्ध हुआ, तो जैसलमेर पूरी मजबूती से भारत का साथ देगा.' 

महारावलों के इसी अडिग फैसले ने जोधपुर और बीकानेर रियासतों के लिए भी एक स्पष्ट मार्ग प्रशस्त किया. इसी वीरतापूर्ण पृष्ठभूमि के बाद मार्च 1949 को जैसलमेर सहित कई रियासतों के एकीकरण के साथ 'वृहद राजस्थान' का गठन हुआ.

अकाल वाली धरती अब उगल रही 'सोना'

जैसलमेर राजघराने के ठाकुर विक्रम सिंह नाचना इस निर्णय को ऐतिहासिक त्याग बताते हैं. वे कहते हैं कि महारावलों ने प्रलोभन त्याग कर प्रजा के हित में भारत को चुना. आज परिणाम सामने हैं. पाकिस्तान अस्थिर है और दुनिया भर में 'कटोरा' लेकर घूम रहा है, जबकि जैसलमेर भारत की प्रगति का चमकता सितारा है.

  • 50 डिग्री की गर्मी अब बिजली पैदा कर रही है.
  • रेतीली आंधियां पवन चक्कियों को घुमाकर देश को रोशन कर रही हैं.
  • रेत के टीले और सोनार किले की चमक ने इसे ग्लोबल टूरिज्म हब बना दिया है.

सांस्कृतिक और सामरिक पहचान

आज जैसलमेर भारत की पश्चिमी सीमा का वह अभेद्य दुर्ग है, जहां भारतीय सेना और बीएसएफ के जवान मरुधरा की रक्षा कर रहे हैं. चाहे वो 'लिविंग फोर्ट' की संकरी गलियां हों या सम के धोरों पर गूंजता मांगणियार लोक संगीत, जैसलमेर के बिना राजस्थान अधूरा है. यह धरती सिर्फ रेत का समंदर नहीं, बल्कि भारत की भौगोलिक विरासत का गौरव है.

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