This Article is From Jan 27, 2026

नकली और खराब दवाओं के ख़तरे, कारण और समाधान

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डॉ. नरेंद्र गुप्ता

राजस्थान में पिछले दिनों जो 16 दवाएं जांच में फेल हो गईं उसमें मुख्य बात यह है कि यह एक नियमित प्रक्रिया है. दवाओं के परीक्षण होते रहते हैं. टेस्ट में सही नहीं पाए जाने पर उन्हें NSQ यानी नॉट स्टैंडर्ड क्वालिटी करार दिया जाता है, यानी उनकी गुणवत्ता सही नहीं पाई जाती. ऐसा कई वजहों से हो सकता है. पहला, मिलावट की वजह से, यानी दवाओं में ऐसी चीज़ें डाल देना जो उसका हिस्सा ही नहीं हैं. और दूसरा, जब उनमें औषधीय सक्रिय तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं होते या उन्हें ठीक से बनाया नहीं गया, जिससे कि अगर वो शरीर में जाती हैं तो उन्हें जितने समय में शरीर में घुलना चाहिए, वो नहीं घुल पातीं जिससे इलाज का सही असर नहीं हो पाता.

मिलावटी दवाओं को लेकर सख़्त क़ानून है. अगर कोई कंपनी दोषी पाई जाती है तो उसके मालिक को आजीवन कारावास की सज़ा हो सकती है. हालांकि ऐसा नहीं हो पाता क्योंकि कंपनियों के वकीलों की लंबी फौज खड़ी हो जाती है. कोई ना कोई तकनीकी मुद्दा निकल जाता है जिसकी वजह से सख़्त सज़ा नहीं मिल पाती.

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दवाओं की गुणवत्ता में कमी दवा निर्माता के स्तर पर भी हो सकती है, और शायद इसी स्तर पर यह सबसे ज़्यादा होती है. लेकिन, इसके अलावा और भी वजह हो सकती हैं. जैसे, दवाओं के ट्रांसपोर्ट में उचित तापमान की कमी. इसके अलावा दवाओं के भंडारण और रिटेल स्तर पर भी कमियां हो सकती हैं. केमिस्ट दुकानों में भी दवाओं को समुचित तरीके से स्टोर नहीं किया जाता.

लैब और ड्रग इंस्पेक्टर्स की कमी सबसे बड़ी समस्या

लेकिन, भारत में इन सभी चीज़ों पर समुचित तरीके से ध्यान नहीं दिया जाता. ये समस्याएं इसलिए भी हैं क्योंकि हमारे यहां रेगुलेटरी सिस्टम प्रभावी नहीं है. भारत में केवल दवाओं के उत्पादन के ही स्तर पर अगर क्वालिटी टेस्ट करनी हो तो कम-से-कम 3,000 ड्रग इंस्पेक्टर्स की आवश्यकता होगी, जबकि अभी पूरे भारत में 1500 से भी कम ड्रग इंस्पेक्टर्स हैं.

इसके अलावा एक और अहम अंतर ये है कि जब राजस्थान और कई अन्य राज्यों में सरकारें दवाएं खरीदती हैं तो दवा निर्माता उन्हें सीधे ज़िले में भेज देता है, जहां उन्हें रखने के लिए वेयरहाउस होते हैं. वहां क्वारंटाइन सेक्शन होता है जहां दवाओं का कुछ हिस्सा रखा जाता है. इस सेक्शन से ही दवाओं की टेस्टिंग की जाती है, और अगर वे सही पाई गईं तो उसके बाद उनका वितरण होता है. लेकिन यही व्यवस्था खुदरा दवाओं की बिक्री में नहीं लागू होती जहां से आम लोग दवाएं लेते हैं. अगर ऐसा हो जाए तो समस्या को और दूर दिया जा सकेगा.

हमारे यहां रेगुलेटरी सिस्टम प्रभावी नहीं है. भारत में केवल दवाओं के उत्पादन के ही स्तर पर अगर क्वालिटी टेस्ट करनी हो तो कम-से-कम 3,000 ड्रग इंस्पेक्टर्स की आवश्यकता होगी, जबकि अभी पूरे भारत में 1500 से भी कम ड्रग इंस्पेक्टर्स हैं.

राजस्थान में अभी जिन 16 दवाएं टेस्टिंम में नाकाम रहीं, उन्हें रिटेल दुकानों से ही चुना गया था. अगर दवाओं के उत्पादन से लेकर सप्लाई-चेन प्रक्रिया तक की निगरानी ठीक से की जाए तो समस्या काफ़ी कम हो सकती है. साथ ही यह भी समझा जाना ज़रूरी है कि जो दवाएं फेल होती हैं, उनमें बड़ी कंपनियों के सैंपल भी शामिल होते हैं.

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वर्ष 2012 में जब पंचवर्षीय योजना बनी थी तो मैं भी उसके एक वर्किंग ग्रुप का सदस्य था. तब हमने यह सिफ़ारिश की थी, कि देश के हर ज़िले में खाने के सामानों में मिलावट की जांच के लिए एक लैब होना चाहिए. साथ ही दवाओं की जांच के लिए देश के हर संभाग (डिवीज़न) में दवाओं की जांच के लिए एक टेस्टिंग लैब होनी चाहिए. हमारा मानना था कि इतने लैब होने ज़रूरी हैं, और अगर ऐसा नहीं होता है तो समस्या बनी रहेगी. लेकिन, अभी भी उस दिशा में काम किए जाने की ज़रूरत है.

वैसे दवाओं के अच्छी तरह से उत्पादन का चलन बढ़ता जा रहा है. इसकी मुख्य वजह ये है कि अब केंद्र और राज्य सरकारों ने यह शर्त लगा दी है कि वे ऐसी कंपनियों से ही दवाएं लेंगी, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंडों का पालन करती हैं और जिन्हें GMP (Good manufacturing practices) का सर्टिफ़िकेट प्राप्त है. इसलिए दवा कंपनियों पर भी दबाव रहता है.

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इसके साथ ही, अधिकारियों की ओर से अब ये भी दावा किया जाता है कि पहले की तुलना में स्थिति में काफी सुधार हुआ है और अब कम गुणवत्ता वाली दवाओं के टेस्ट में फेल होने का प्रतिशत कम हुआ है. लेकिन ऐसा दवाओं में API (Active Pharmaceutical Ingredient) या सक्रिय औषधीय तत्व की सीमा में बदलाव किए जाने की वजह से हो रहा है. ये तत्व ही दवा में असल चीज़ होते हैं. पहले दवाओं में API की निर्धारित सीमा 95 से 105 प्रतिशत थी. यानी अगर 5 प्रतिशत कम हो या 5 प्रतिशत ज़्यादा तो दवा टेस्ट में फेल हो जाती थी. उस सीमा को अब बढ़ाकर 90 से 110 प्रतिशत कर दिया गया है जिससे दवाएं अब पहले की तरह अमान्य नहीं होतीं और उनके टेस्ट में कामयाब रहने की संभावना बढ़ गई है.

आम लोग रिपोर्ट नहीं करते

जहां तक दवाओं के नकली होने या कम गुणवत्ता वाली होने के आम लोगों पर प्रभाव की बात है, तो इसमें समस्या दोनों ओर से है और आम लोग भी इसे लेकर जागरूक नहीं हैं. हमारे यहां आम धारणा ये है कि लोग किन्हीं खास डॉक्टर को ही अच्छा मानते हैं जबकि इलाज का तरीका और दवाएं कमोबेश एक ही होते हैं. लेकिन होता यह है कि जब दवा काम नहीं करती तो लोग दूसरे डॉक्टर के पास चले जाते हैं और कहते हैं कि दवा काम नहीं कर रही. ऐसे में डॉक्टर दूसरी दवा दे देता है जिसके तत्व समान ही होते हैं.

चीन में कोविड का पता तब चला जब एक मरीज़ बुख़ार और दूसरे लक्षणों के बाद डॉक्टर के पास गया और उसे दवा दी गई. लेकिन जब उसका असर नहीं हुआ तो डॉक्टर को लगा कि शायद कुछ और हो रहा है.

चीन में कोविड का पता तब चला जब एक मरीज़ बुख़ार और दूसरे लक्षणों के बाद डॉक्टर के पास गया और उसे दवा दी गई. लेकिन जब उसका असर नहीं हुआ तो डॉक्टर को लगा कि शायद कुछ और हो रहा है. इसके बाद जांच की गई और कोविड का पता चला. लेकिन भारत में यह होता ही नहीं. यहां तो ऐसी स्थिति हो तो बहुत समय तक पता ही नहीं चलेगा क्योंकि या तो लोग डॉक्टर बदल देंगे या दवा बदल देंगे.

अगर दवा काम नहीं कर रही है तो दो संभावनाएं हो सकती हैं. या तो उस दवा में कोई कमी है. या वह कोई और बीमारी है जिसका पता नहीं चल पा रहा. लेकिन भारत में ऐसी कोई शिकायत होती ही नहीं.

समाधान के प्रयास

दवाओं की गुणवत्ता बनी रहे, इसके लिए हमें कुछ ज़रूरी प्रयास करने होंगे. पहला, ज़्यादा से ज़्यादा टेस्टिंग करनी चाहिए. इनमें जिस कंपनी का सैम्पल नाकाम रहे उस कंपनी के खिलाफ व्यापक जांच कर इसकी रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए. साथ ही, नागरिकों में भी जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए जिससे कि अगर दवा काम ना करे तो वे डॉक्टर के पास जाएं और बताएं कि दवा काम नहीं कर रही. 

खांसी, ज़ुकाम आदि की दवाओं में अगर कोई कमी रहे तो वह उतना गंभीर नहीं होता लेकिन बीपी और डायबिटीज़ जैसी बीमारियों में लंबे समय तक इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं की गुणवत्ता अगर ठीक नहीं हो तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

लेखक परिचयः डॉक्टर नरेंद्र गुप्ता राजस्थान के एक वरिष्ठ डॉक्टर और जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं. चित्तौड़गढ़ स्थित डॉक्टर गुप्ता राजस्थान के वंचित समुदायों के बीच 40 से अधिक वर्षों से काम कर रहे हैं. वह ग़ैर सरकारी संगठन 'प्रयास' तथा 'जन स्वास्थ्य सहयोग' (JSS) के संस्थापक हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में समाज के वंचित तबकों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराता है और उनकी आवाज़ उठाता है. डॉ. गुप्ता जन स्वास्थ्य अभियान नामक आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजकों में शामिल हैं जो मुफ़्त स्वास्थ्य सुविधाएं दिए जाने की हिमायत करता है.

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. 

(अपूर्व कृष्ण के साथ बातचीत पर आधारित लेख)

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