अजमेर के किशनगढ़ में सामाजिक बदलाव की एक बड़ी झलक देखने को मिली, जहां दो बेटियों ने बेटे का फर्ज निभाते हुए अपने पिता का अंतिम संस्कार किया. हाउसिंग बोर्ड निवासी 74 वर्षीय जगदीश प्रसाद गर्ग के निधन के बाद उनकी बेटियों, मीनाक्षी और निशा ने अर्थी को कंधा दिया, और मुखाग्नि दी. घटना ने स्पष्ट संदेश दिया है कि जिम्मेदारियों के निर्वहन में बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं हैं.
बेटियां किसी से कम नहीं
समाज में आज भी अंतिम संस्कार से जुड़ी कई परंपराएं केवल बेटों तक सीमित मानी जाती हैं, लेकिन मीनाक्षी और निशा ने इस सोच को चुनौती दी है. उन्होंने बिना किसी दिखावे के यह साबित कर दिया कि संस्कार, कर्तव्य और प्रेम बेटा बेटी से नहीं, भावनाओं से जुड़े होते हैं.
परिवार ने की सराहना
जगदीश प्रसाद गर्ग की दोनों बेटियां मीनाक्षी और निशा ही किशनगढ़ में विवाहित हैं. पिता के निधन के बाद दोनों बेटियों ने पूरे आत्मविश्वास और सम्मान के साथ हर धार्मिक और सामाजिक दायित्व निभाया. अंतिम यात्रा में शामिल लोगों ने बेटियों के इस कदम की खुलकर सराहना की और इसे समाज के लिए प्रेरणादायक बताया.
बदलते समाज की झलक बनी अंतिम यात्रा
हाउसिंग बोर्ड क्षेत्र में हुई यह अंतिम यात्रा केवल एक व्यक्ति के जीवन के अंत की कहानी नहीं रही, बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों की झलक भी बनी. बेटियों द्वारा निभाया गया यह संवेदनशील और साहसिक दायित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत संदेश छोड़ गया कि रिश्ते और जिम्मेदारियां परंपराओं से नहीं, इंसानियत से तय होती हैं.
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