Analysis: मुख्यमंत्री चेहरे के लिए वसुंधरा राजे के अलावा भाजपा के पास ज़्यादा विकल्प नहीं!

वसुंधरा के पास बीजेपी के क़रीब आधे विधायकों का समर्थन है. ऐसे में भाजपा लोकसभा चुनाव से पहले कोई राजनीतिक ड्रामा नहीं चाहेगी. शायद वो कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई के बाद उसकी स्थिति से कोई सबक़ हासिल कर ले. 

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वसुंधरा राजे ( फाइल फोटो)

राजस्थान में विधानसभा चुनाव खत्म हो गए हैं. भाजपा ने 115 सीटें जीत कर बहुमत हासिल कर लिया है. लेकिन अभी तक मुख्यमंत्री (Who Will Be Rajasthan Chief Minister)  को लेकर कोई तस्वीर साफ़ नहीं हुई है. लगभग आधे दर्जन से ज़्यादा नेता CM की दौड़ में हैं. कई नाम मीडिया में तैर रहे हैं. लेकिन उनमें सबसे ज़्यादा जिस नाम की चर्चा है वो राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) हैं.

दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकीं वसुंधरा राजे सिंधिया CM की दौड़ में सबसे आगे नज़र आ रही हैं. बुधवार को देर  रात वसुंधरा राजे को दिल्ली 'बुलाया' गया था. आज दिल्ली में संसदीय बोर्ड की मीटिंग होने वाली है, जिसमें मुख्यमंत्री का नाम तय होने की संभावना है. 

गौरतलब है चुनाव नतीजों के दूसरे दिन वसुंधरा के कई 'समर्थक' विधायक उनसे मिलने उनके अवास पर पहुंचे थे. मीडिया रिपोर्ट्स में राजे से मिलने वाले विधायकों की तादाद 50 से अधिक बताई गई थी. उनसे मिलने आए कई विधायकों ने खुलकर मीडिया के सामने वसुंधरा को CM बनाने की बात कही तो कुछ ने इसे 'शिष्टाचार' मुलाक़ात बताया.

राजे से मुलाक़ात करने वाले विधायकों की संख्या काफी कुछ बता रही है. इसे एक मूक शक्ति प्रदर्शन के तौर पर माना जा सकता है. अगर वसुंधरा राजे का मुख्यमंत्री का दावा मज़बूत है तो उसके कई जायज़ कारण भी हैं तो कुछ ऐसे भी कारण हैं, जो उनकी दावेदारी को कमज़ोर भी करते हैं.

राजे के पास एक लम्बा प्रशासनिक अनुभव है. उनके अलावा राजस्थान भाजपा में ऐसा कोई नेता नज़र नहीं आता है. उसकी वजह ये भी है कि भैरो सिंह शेखावत के बाद राजस्थान में कोई नेता इस क़द का नहीं बन पाया है, जो उनकी दावेदारी को मज़बूत करता है. हालांकि जानकारों की मानें तो भाजपा आलकमान वसुंधरा को अधिक तव्ज्जों नहीं देती दिख रही हैं.

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ऐसा भी कहा जाता है कि मोदी-शाह की जोड़ी में भाजपा में ऐसे नेताओं को कम पसंद किया जाता है, जो अपना खुद का कोई पॉलिटिकल बेस रखते हैं. मोदी के पहले कार्यकाल में राजस्थान में भाजपा को लोकसभा की सभी 25 सीटें मिलीं थीं. कहा जाता है कि मोदी कैबिनेट में राजस्थान को अधिक प्रतिनिधित्व नहीं मिलने पर राजे ने दिल्ली में जम गईं थीं. 

वसुंधरा दो बार सीएम रह चुकी हैं. वो पहली बार 2003 में मुख्यमंत्री बनीं उसके बाद 2008 के चुनाव में भाजपा हार गई. वसुंधरा ने 2013 चुनाव फिर धमाकेदार आगाज किया और दूसरी बार सीएम बनीं. अब अगर तीसरी बार भी वो सीएम चुनी जाती हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

दीगर बात यह है कि 2023 चुनाव में 115 सीट जीतकर एक पूर्ण बहुमत सरकार बनाने जा रही भाजपा पर वसुंधरा को सीएम बनाने का कोई दवाब नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि वसुंधरा ने जीतकर आए क़रीब आधे विधायकों माजमा लगाकर संकेत जरूर दिए हैं. संभव है कि लो बीजेपी आलाकमान लोकसभा चुनाव 2024 से कड़ा फैसला लेने से बचे. . 

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वसुंधरा के पक्ष में बाजी तभी पलट सकती है, जब संघ भी उनका समर्थन कर दे, लेकिन इसमें भी पेंच है. माना जाता है कि राजे आरएसएस के उतने 'क़रीब' नहीं हैं. दरअसल, 2018 के चुनाव में आरएसएस ने वसुंधरा का 'साथ' नहीं दिया था और राजे सत्ता से बेदखल हो गईं थीं. .

इस बार की तस्वीर कुछ अलग है. भाजपा के अंदरूनी सांगठनिक परिवेश में RSS की अहमियत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि नतीजों के बाद राजे सबसे पहले आरएसएस ऑफिस गईं. राजे जानतीं हैं कि राजस्थान में CM का चेहरा तय करते वक़्त आरएसएस की राय ली जाएगी.

उल्लेखनीय है राजस्थान में सीएम की रेस में वसुंधरा राजे के अलावा कई चेहरे आगे हैं. इनमें विद्याधर नगर सीट से जीतकर आईं दीया कुमारी प्रमुख हैं. वहीं, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और लोकसभा सभा स्पीकर ओम बिरला और केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल प्रमुख हैं. 

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