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गहलोत की नसीहत से राजस्थान में परिवारवाद के मुद्दे पर सियासत गरम, अब आमने सामने दिख रही है बीजेपी-कांग्रेस

राजस्थान की सियासत में परिवारवाद का मुद्दा काफी सुर्खियों में है. हालांकि हर बार परिवारवाद का मुद्दा उठाने वाली बीजेपी को कांग्रेस ने इस मुद्दे पर घेरा है.

गहलोत की नसीहत से राजस्थान में परिवारवाद के मुद्दे पर सियासत गरम, अब आमने सामने दिख रही है बीजेपी-कांग्रेस
राजस्थान में परिवारवाद पर छिड़ी बहस

Rajasthan Politics: अकसर ऐसा देखा जाता है कि बीजेपी परिवारवाद का मुद्दा उठाती है और कांग्रेस को घेरा जाता है. लेकिन मौजूदा समय में राजस्थान में परिवारवाद का मुद्दा सियासत में सुर्खियों में है. लेकिन इस बार इस मुद्दे को बीजेपी की ओर से नहीं कांग्रेस की ओर से उठाया गया है. इसकी चिंगारी उस वक्त भड़क गई जब पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने अपने एक बयान में सरकार के मंत्रियों को नसीहत देते हुए कहा था कि वह अपने बेटों को सरकारी काम काज से दूर रखे. क्योंकि इससे सरकार की बदनामी होती है. इस बयान से प्रदेश में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच अपने-अपने नैरेटिव सेट करने की कवायद में बदल चुका है.

दरअसल अशोक गहलोत ने 26 मार्च को जयपुर एयरपोर्ट पर  मीडिया से बातचीत कहा कि मंत्रियों के परिजन खासकर बेटे, सरकारी कामों में दखल न दें. उनका इशारा सीधे सत्ता के भीतर कथित इन्फ्लुएंस की ओर था. लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे सिर्फ एक सलाह नहीं बल्कि सिस्टम में गहराई तक मौजूद उस कल्चर पर टिप्पणी माना गया, जहां 'परिवार' सत्ता का अनौपचारिक हिस्सा बन जाता है.

मदन राठौड़ गहलोत को दी उलटी नसीहत

वहीं गहलोत के बयान के बाद BJP ने पलटवार किया. प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने गहलोत पर सियासी हमला करते हुए कहा कि गहलोत खुद 'पुत्र मोह' से बाहर नहीं हैं और कई सालों से अपने बेटे वैभव गहलोत को आगे बढ़ाने की राजनीति करते रहे हैं. संसदीय कार्यमंत्री जोगाराम पटेल ने कहा जिनके घर क्लास के होते हैं वे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते परिवारवाद और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कांग्रेस को किसी दूसरे पर अमूल उठाने का कोई अधिकार नहीं है. पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने बाकायदा प्रेस वार्ता कर कहा कि गहलोत ने जो बयान दिया है लेकिन क्या अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने यह  नसीहत अपनाई थी पुत्र मोह के चलते उन्होंने अपने बेटे वैभव गहलोत को दो बार चुनाव लड़वाने लड़वाया लेकिन जनता ने उन्हें नकार दिया. यह वही अशोक गहलोत हैं जिन्होंने आरसीए में अपने बेटे वैभव गहलोत की ताज़पोशी के लिए कांग्रेस के नेता रामेश्वर डूडी को साइडलाइन किया था अब वही नसीहत दे रहे हैं. 

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भी इस मुद्दे बयान दिया. मुख्यमंत्री ने कहा सोनिया गांधी अपने पुत्र राहुल गांधी को और अशोक गहलोत अपने पुत्र वैभव गहलोत को कई बार सियासी तौर पर लॉन्च करने की नाकाम कोशिश कर चुके हैं. लेकिन जनता ने नकार दिया है.

गहलोत ने अपने ही बयान को किया स्पष्ट

विवाद बढ़ा तो अशोक गहलोत ने अपनी बात स्पष्ट की. उन्होंने कहा कि उनका मतलब राजनीति से नहीं बल्कि सरकारी कामकाज से दूरी रखने से था. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने अपने बेटे को सरकारी आवास में नहीं रखा और हमेशा एक 'लाइन ऑफ डिस्टिंक्शन' बनाए रखी. अगर दूसरे प्रोफ़ेशन में बच्चे विरासत को लेकर चल सकते है तो उन्हें सियासत में भी रोका नहीं जाना चाहिए. अगर क़ाबिलीयत होगी तो परिवार का कोई बेटा बेटी साला साली रिश्तेदार राजनीति में क़ामयाब हो सकता है. 

राजस्थान में परिवारवाद की जमीनी हकीकत क्या कहती है 

राजस्थान की राजनीति में परिवारवाद कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक स्थापित सच है. आंकड़ों के मुताबिक करीब 20% विधायक राजनीतिक परिवारों से आते हैं. कांग्रेस में यह प्रतिशत अधिक माना जाता है लेकिन BJP भी इससे अछूती नहीं है. राजस्थान में कई परिवार ऐसे हैं, जहां दूसरी और तीसरी पीढ़ी सक्रिय है. गहलोत परिवार- अशोक गहलोत -वैभव गहलोत, पायलट परिवार सचिन पायलट (पिता राजेश पायलट की विरासत) राजे परिवार- वसुंधरा राजे -दुष्यंत सिंह, मिर्धा परिवार- ज्योति मिर्धा, राजघराने- दीया कुमारी, विश्वराज सिंह मेवाड़ यह लिस्ट बताती है कि “वंश” यहां राजनीतिक पूंजी भी है और पहचान भी.

राजनीतिक विश्लेषक अरविंद चोटिया के मुताबिक़ परिवारवाद की कामयाबी के पीछे इसके पीछे कई कारण हैं. सबसे बड़ी वजह पहचान और भरोसा होना है. मतदाता परिचित नामों पर भरोसा करते हैं संगठन पर पकड़ भी बड़ी वजह है.परिवार के पास पहले से नेटवर्क और संसाधन होते हैं. जातीय समीकरण भी बहुत अहम है. कई बार परिवार ही जातीय नेतृत्व का चेहरा बन जाता है लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है नए और जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए मौके सीमित होते हैं लोकतंत्र में “प्रतिस्पर्धा” की जगह “विरासत” हावी हो जाती है

BJP मामले को 'मेरिट बनाम वंशवाद' के रूप में पेश कर रही

वहीं कांग्रेस इसे 'राजनीतिक बयानबाजी' और 'डायवर्जन' बता रही है. राजस्थान में परिवारवाद पर छिड़ी यह बहस अब सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है. यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुकी है, जहां हर दल अपने हिसाब से नैरेटिव सेट करना चाहता है. अशोक गहलोत की एक नसीहत ने जिस बहस को जन्म दिया, वह अब सत्ता बनाम विपक्ष के बड़े वैचारिक संघर्ष में बदल चुकी है.  जनता के बीच आने वाले निकाय पंचायत चुनावों में यह मुद्दा आक्रामक तरीके से उठेगा इसकी प्रबल संभावना है.

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