भरतपुर राजघराने में 'जंग': सिनसिना तोप के साथ महाराजा विश्वेंद्र सिंह की हुंकार, 13 फरवरी को मोती महल में आर-पार!

31 जनवरी की इस तस्वीर ने भरतपुर में खलबली मचा दी है! सिनसिना तोप के पास खड़े महाराजा विश्वेंद्र सिंह ने अपनी ही पत्नी और बेटे को वो चुनौती दे डाली है, जिससे 13 फरवरी को मोती महल अखाड़ा बन सकता है.

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सिनसिना तोप के साथ पूर्व कैबिनेट मंत्री विश्वेंद्र सिंह की तस्वीर.
Facebook@Vishvendra Singh

Rajasthan News: राजस्थान के सबसे चर्चित राज परिवारों में से एक, भरतपुर राजघराने की 'शाही जंग' अब सोशल मीडिया की दीवारों से निकलकर मोती महल की प्राचीर तक पहुंचने को बेताब है. आज, यानी 31 जनवरी 2026 को पूर्व कैबिनेट मंत्री और महाराजा विश्वेंद्र सिंह ने एक ऐसी तस्वीर साझा की है, जिसने विरोधियों के खेमे में खलबली मचा दी है. विश्वेंद्र सिंह ने आज मोती महल परिसर में स्थित ऐतिहासिक 'सिनसिना तोप' के साथ अपना एक ताजा फोटो फेसबुक पर अपलोड किया. जानकार इसे महज एक तस्वीर नहीं, बल्कि युद्ध का बिगुल मान रहे हैं. तोप के साथ खड़ा होना इस बात का प्रतीक है कि महाराजा अब समझौते के मूड में नहीं हैं.

'हिम्मत है तो रोक लो मुझे' – खुली चुनौती

दो दिन पहले ही विश्वेंद्र सिंह ने फेसबुक पर एक पोस्ट के जरिए अपने इरादे साफ कर दिए थे. उन्होंने अपनी पत्नी दिव्या सिंह और बेटे अनिरुद्ध सिंह को सीधी चुनौती देते हुए लिखा था, 'या तो मेरी पत्नी और बेटा भरतपुर रियासत के झंडे को फिर से लगा दें, नहीं तो मैं स्वयं 13 फरवरी को महाराजा सूरजमल जी के जन्मदिवस पर खुद मोती महल जाकर झंडा फहराऊंगा. किसी में हिम्मत है तो रोक कर दिखा देना मुझे.' महाराजा ने यह भी खुलासा किया कि झंडा फहराने से रोकने के लिए झंडे की रस्सी और तार तक काट दिए गए हैं, लेकिन वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं.

विवाद की जड़: क्या है पूरा मामला?

भरतपुर राजपरिवार का यह विवाद पिछले 5 सालों से लगातार सुलग रहा है, जिसके केंद्र में मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं. सबसे पहला मुद्दा झंडे के मान-सम्मान से जुड़ा है. दरअसल, सितंबर 2025 में मोती महल पर 'युद्ध भूमि' का झंडा लगाया गया था, जिसका सर्व समाज ने कड़ा विरोध किया. भारी दबाव और पंचायतों के दौर के बाद वह झंडा तो हटा दिया गया, लेकिन तब से वहां रियासतकालीन झंडा वापस नहीं लगा है. फिलहाल महल की छत सूनी है और महाराजा विश्वेंद्र सिंह इसे अपनी व्यक्तिगत और राजसी प्रतिष्ठा का प्रश्न मान रहे हैं.

वहीं, पर्दे के पीछे की असली लड़ाई करोड़ों की संपत्ति और शाही खजाने को लेकर चल रही है. विवाद की एक बड़ी वजह राजघराने की बेशकीमती प्रॉपर्टी, पुश्तैनी स्वर्ण-आभूषण और एंटीक आइटम का वह शाही भंडार है, जिसकी कीमत अरबों में आंकी जाती है. इन सब के बीच पारिवारिक बिखराव ने आग में घी डालने का काम किया है. विश्वेंद्र सिंह का अपनी पत्नी दिव्या सिंह और बेटे अनिरुद्ध सिंह के साथ वैचारिक और कानूनी टकराव अब जगजाहिर हो चुका है. महाराजा का तो यहां तक आरोप है कि परिवार का यह विवाद सुलझने के बिल्कुल करीब था, लेकिन उनकी पत्नी और बेटे ने रियासतकालीन झंडा न लगाकर इस पूरे मामले को एक बार फिर बुरी तरह उलझा दिया है.

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13 फरवरी: क्यों अहम है यह तारीख?

13 फरवरी को महान शासक महाराजा सूरजमल की जयंती है. भरतपुर के लोगों के लिए यह दिन गौरव का प्रतीक है. विश्वेंद्र सिंह इसी दिन को चुनकर एक बड़ा भावनात्मक दांव खेल रहे हैं. अगर उस दिन महाराजा मोती महल कूच करते हैं, तो प्रशासन के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी.

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