Bhuteshwar Mahadev Mandir: छोटी काशी के नाम से मशहूर जयपुर में भक्ति और रहस्य का एक अनोखा संगम मिलता है. यहां की अरावली पहाड़ियों की गोद में, आमेर के नाहरगढ़ अभयारण्य की गहराई में लगभग 2100 वर्ष पुराने प्राचीन भूतेश्वर नाथ महादेव मंदिर का एक ऐसा धाम स्थित है जो आस्था के साथ-साथ रोमांच भी जगाता है. शहर के शोर-शराबे से दूर, घने जंगलों के बीच बसे इस मंदिर को लेकर कई बड़ी ही दिलचस्प और रोंगटे खड़े कर देने वाली लोककथाएं प्रचलित है. कहा जाता है कि सदियों पहले इस निर्जन स्थान पर इंसानों से पहले भूत-प्रेत महादेव की आराधना करने आते थे, इसी कारण इसका नाम 'भूतेश्वर' पड़ा. आज भी जब भक्त नाहरगढ़ की ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों को पार कर यहां पहुंचते हैं, तो उन्हें एक शांति और देवत्व का अहसास होता है. माना जाता है कि आमेर की पहाड़ियों में बसे इस मंदिर में सच्चे मन से जो भक्त महादेव के पास अपनी अर्जी लगाता है भूतेश्वर नाथ महादेव उसे पूरा कर देते हैं.
स्वयंभू शिवलिंग आवाज देकर बाहर निकले बाबा भूतेश्वर नाथ
शिवरात्रि के पावन दिनों में भूतेश्वर महादेव का दरबार आस्था से गुलजार हो उठता है, लेकिन भोलेनाथ के दर्शन पाना यहां किसी कठिन तपस्या से कम नहीं है. मंदिर जाने का रास्ता नहरगढ़ अभयारण्य के करीब 8 किमी अरावली की ऊंची-नीची पहाड़ियों और घने जंगलों से होकर गुजरता है. यहां की पहाड़ियों में बसे स्थानीय लोगों की भूतेश्वर महादेव को लेकर गहरी आस्था और अटूट विश्वास की कहानियां हैं. पहली लोक मान्यता के अनुसार, यहां विराजमान शिवलिंग कोई मानवनिर्मित नहीं, बल्कि एक 'स्वयंभू' विग्रह है. कहा जाता है कि महादेव ने स्वयं अपनी पुकार से अपनी उपस्थिति का आभास कराया और यहीं प्रकट हो गए.
भूतेश्वर महादेव के दर्शन करते हुए भक्त
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संत के आगमन से भूतेश्वर हुए प्रतिष्ठित
मंदिर के महंत सोनू शर्मा के अनुसार, एक दौर ऐसा था जब चारों ओर फैले भयानक सन्नाटे और निर्जन जंगल के बीच महादेव का यह विग्रह विराजमान था. लोकमान्यता है कि उस समय यहां इंसानों का बसेरा नहीं, बल्कि भूत-प्रेतों का डेरा हुआ करता था और वही अदृश्य शक्तियां महादेव की अर्चना किया करती थीं. फिर कुछ समय बाद इस वीराने में एक सिद्ध संत का आगमन हुआ. उन्होंने महादेव की ऐसी कठोर तपस्या की उनके सामने आसुरी शक्तियां टिक न सकीं और धीरे-धीरे इस स्थान को छोड़कर चली गई. संत की साधना और पुकार पर स्वयं महादेव यहां 'भूतेश्वर' के रूप में प्रतिष्ठित हो गए.
संतो की प्राचीन 'धूणा'
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4 संतों में से एक संत ने ली जीवित समाधि
इस मंदिर की स्थापत्य कला को निहारते हैं, तो इसके मुख्य मंडप और गुंबद 17वीं शताब्दी की झलक को दिखाती है. हालांकि वक्त के साथ मंदिर के स्वरूप में कुछ आधुनिक बदलाव जरूर आए हैं, लेकिन आज भी घने और शांत जंगलों के बीच इसकी रूहानी चमक वैसी ही बनी हुई है. इस स्थान का नाता जयपुर की स्थापना से भी पुराना है. साल 1727 में सवाई जयसिंह के जरिए जयपुर बसाए जाने से पहले, कच्छावा राजवंश आमेर में रहती थीं. आमेर, जिसे उन्होंने मीणा शासकों से शौर्य के बल पर जीता था, न केवल सत्ता का केंद्र था बल्कि आध्यात्म का भी एक बड़ा गढ़ बना.
लोकमान्यताओं के अनुसार, इसी दौर में चार महान संतों की टोली यहां आकर ठहरी. उनके कठिन तप ने इस साधारण से स्थान को एक 'सिद्ध पीठ' में बदल दिया. कहा जाता है कि इनमें से एक परम सिद्ध संत ने यहीं 'जीवित समाधि' ली थी, जबकि अन्य तीन संत समय चक्र के साथ देवलोक गमन कर गए. आज भी उन चारों संतों की समाधियां मंदिर परिसर के भीतर हैं. उनकी प्राचीन 'धूणा' आज भी सुरक्षित है, जहां बैठकर वे अपनी साधना किया करते थे. इस स्थान की पवित्रता और वहां की आध्यात्मिक ऊर्जा को बनाए रखने के लिए वहां आम लोगों का प्रवेश वर्जित है, ताकि सदियों से चली आ रही वह साधना की शक्ति खंडित न हो.
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Report By: Rohan Sharma