झालावाड़ के छात्रों द्वारा खोजे गए 4 क्षुद्रग्रहों में से एक का नाम स्कूल की इमारत ढहने से जान गंवाने वाले 7 बच्चों की स्मृति में उनके नाम पर रखा जाएगा. पचपहाड़ गवर्मेंट महात्मा गांधी स्कूल के शिक्षक डॉ. दिव्येंदु सेन के अनुसार, क्षुद्रग्रह खोजने वाले छात्रों ने भी अपनी लिखित रूप में सहमति जताई है. उनके द्वारा खोजे गए क्षुद्रग्रह (2021 DB5) का नाम पिपलोदी हादसे में जान गंवाने वाले बच्चों की स्मृति में रखा जाए.
इसका प्रस्तावित नाम 'प्रमिश्का' है, जो 7 दिवंगत बच्चों पायल (13), प्रियंका (12), मीना (12), हरीश (11), कुंदन (10), कान्हा (7) और सतीश (8) के नामों के शुरुआती अक्षरों को जोड़कर बनाया है, इससे यह नाम अंतरिक्ष मे लाखों वर्षों तक (लगभग हमेशा के लिए) अमर हो जाएंगे. इस बात की पुष्टि नासा द्वारा कर दी गई है, और इन्हें परमानेंट नंबर अलॉट कर दिया है.
छात्रों ने 4 क्षुद्रग्रहों की खोज की थी
झालावाड़ महात्मा गांधी सरकारी स्कूल टीचर डॉ. दिव्येंदु सेन के सानिध्य में बच्चे (स्कूल वैज्ञानिक) ने वर्ष 2020-21 में चार क्षुद्रग्रहों की खोज की थी. ये चारों क्षुद्रग्रहों ने सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लिया है, और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थायी नंबर मिल गया है. इससे उनकी कक्षाएं पूरी तरह स्थापित और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो चुकी हैं.
टीचर डॉ. दिव्येंदु सेन.
टीचर डॉ. दिव्येंदु के मार्गदर्शन में क्षुद्रग्रहों को खोजा
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, उन्हेल की छात्रा सुगंधा कुमारी, कोमल कुंवर, हर्षिता डांगी और संजय कुमार ने इन क्षुद्रग्रहों की खोज की है. अब ये स्टूडेंट्स अलग-अलग कॉलेजों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं. डॉ. दिव्येंदु सेन के मार्गदर्शन में स्टूडेंट्स ने IASC–NASA एस्टेरॉयड सर्च कैंपेन में भाग लिया था. अब तक 100 से अधिक स्टूडेंट्स इस कार्यक्रम में भाग ले चुके हैं, और सामूहिक रूप से 12 मेन-बेल्ट क्षुद्रग्रहों की खोज कर चुके हैं.
क्षुद्रग्रहों ने अपनी कक्षा पूरी कर ली है
डॉ. सेन ने बताया कि दिसंबर में इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल सर्च कोलैबोरेशन (IASC) से ई-मेल प्राप्त हुआ, इसमें बताया कि 2020-21 के दौरान खोजे गए चारों क्षुद्रग्रहों ने अपनी कक्षा पूरी कर ली है, इनमें से 3 को इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन द्वारा स्थायी नंबर आवंटित किए हैं. चार में से एक क्रमांकित क्षुद्रग्रह संबंधित सर्वेक्षण संस्था के लिए आरक्षित है, जबकि शेष 3 को खोज करने वाले छात्रों ने सुझाए गए नामों के लिए पात्र माना गया है. नामकरण प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देशों और मानदंडों के अनुसार की जाएगी.
"विज्ञान तभी सार्थक बनता है जब वह जीवन को छूता है"
डॉ. सेन ने बताया कि अंतिम नाम तय करने से पहले अन्य संक्षिप्त नामों पर भी विचार किया जा रहा है. उन्होंने कहा, “हम नहीं चाहते थे कि नामकरण केवल एक प्रतीकात्मक कार्य बनकर रह जाए. स्टूडेंट्स ने कहा कि विज्ञान तभी सार्थक बनता है, जब वह जीवन को छूता है. इस नाम के माध्यम से हम चाहते हैं कि बच्चों की स्मृति हमेशा सूर्य की परिक्रमा करती रहे. हमारे लिए यह केवल खगोल विज्ञान नहीं, बल्कि प्रेम और गरिमा के साथ स्मरण है.”
"दिवंगत बच्चों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी"
डॉ. सेन ने यह भी बताया कि किसी क्षुद्रग्रह का नाम इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन की स्वीकृत होने के बाद वह वैज्ञानिक साहित्य का स्थायी हिस्सा बन जाता है, और लाखों वर्षों तक सौरमंडल में बना रहता है. झालावाड़ के मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी राम सिंह मीणा ने कहा कि दिवंगत बच्चों के नाम पर क्षुद्रग्रह का नामकरण एक सच्ची श्रद्धांजलि और स्मरण होगा. युवा वैज्ञानिकों और उनके टीमवर्क की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि यह एक प्रेरणादायक संदेश है कि सरकारी स्कूलों के स्टूडेंट्स अपने मार्गदर्शक के साथ वैज्ञानिक अध्ययन और अंतरिक्ष अन्वेषण के प्रति प्रतिबद्ध है."
"क्षुद्रग्रह सौरमंडल में लाखों वर्षों तक बना रहता है"
उन्होंने बताया कि 'प्रमिश्का' नाम पिपलोदी के बच्चों के नामों के संयुक्त शुरुआती अक्षरों से बनाया है. इस नाम को अंतरिक्ष में भेजकर हम चाहते हैं कि उनकी स्मृति हमेशा सूर्य की परिक्रमा करती रहे. डॉ. सेन ने इस बात पर जोर दिया कि वैज्ञानिक दृष्टि से किसी क्षुद्रग्रह का औपचारिक नाम कितना महत्वपूर्ण होता है. मतलब कि एक क्षुद्रग्रह सौरमंडल में लाखों वर्षों तक बना रहता है. इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन द्वारा एक बार नाम स्वीकृत हो जाने के बाद वह वैज्ञानिक साहित्य का स्थायी हिस्सा बन जाता है. झालावाड़ के मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी राम सिंह मीणा ने बताया कि दिवंगत बच्चों के नाम पर क्षुद्रग्रह का नामकरण एक सच्ची श्रद्धांजलि और स्मरण होगा.
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