Tagaram Bheel: जैसलमेर के मूलसागर में जन्मे प्रसिद्ध अलगोजा वादक तगाराम भील को कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्म श्री पुरस्कार से नवाजे जाने की घोषणा की गई है.आपको बता दें कि तगाराम भील ने पारंपरिक लोक वाद्य यंत्र अलगोजा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और 35 से अधिक देशों में अपनी कला का जादू फैला चुके हैं.
तगाराम का जन्म टोपणराम भील के घर हुआ था. इनका परिवार परमार भील समाज से है.इनके पिता कई साल पाकिस्तान के सिंध में रहे और वहीं से यह कला सीखकर आए थे. लेकिन तगाराम का जन्म जैसलमेर से 10 किलोमीटर दूर मुलसागर में हुआ और मुलसागर को ही अपनी कर्मभूमि बनाया. जब तक तगाराम का जन्म हुआ तो उनके पिता केवल मनोरंजन के लिए अलगोजा बजाते थे.
7 साल की उम्र से अलगोजा बजाने की शुरुआत
घर की स्थिति को देखते हुए तगाराम के पिता ने उन्हें बकरियां चराने के लिए भेज देते थे और स्वयं ऊंट पर लकड़ी बेचकर घर का भरण पोषण करते थे. तगाराम को 7 साल की उम्र से अलगोजा में रुचि थी, तगाराम चोरी छुपे पिता का अलगोजा जंगल में ले जाते और बजाने का प्रयास करते. करीब 15 साल की उम्र में तगाराम अलगोजा के माहिर खिलाड़ी बन गए और वो अलगोजा की साधना में लीन हो गए.
पद्म श्री अवार्ड से होंगे सम्मानित
साल 1981 में स्वतंत्रता के एक कार्यक्रम के लिए अलगोजा बजाने वाले की जरूरत थी, तब तगाराम जी को पहली बार मंच पर कार्यक्रम करने का मौका मिला. उसके बाद तगाराम भील ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. वह दिन था और आज का दिन है तगाराम भील लगातार अलगोजा के माध्यम से इस संस्कृति को बचाते हुए देश और विदेश तक अलगोजा के संगीत को पहुंचा रहे हैं. 1981 में उनके जीवन में बदलाव की शुरुआत हुई और आज उन्हें पद्म श्री अवार्ड से नवाजने की घोषणा हुई है.
35 से अधिक देशों तक पहुंचा अलगोजा
इतना ही नहीं, तगाराम भील अपने अलगोजा की कला के दम पर यूरोप और अमेरिका सहित 35 से अधिक देशों में राजस्थान का नाम रोशन कर चुके हैं. कठिन कलाओं में से अलगोजे को बजाने वाले फनकारों की तादाद राजस्थान में ना के बराबर बची है. तगाराम इस कला का संरक्षण करने के साथ ही उसे आने वाली पीढ़ियों को बजाना भी सिखा रहे हैं. देश नहीं अपितु विदेशों में भी उनके कई स्टूडेंट हैं, जो कि उनसे अलगोजा सीख चुके हैं.
''नया अलगोजा खरीदने के पैसे नहीं थे''
तगाराम भील की अलगोजा के प्रति प्यार और लगन का अंदाजा हम इसी बात से लगा सकते हैं कि जब वो अलगोजा बजाना सीखे और पिता से मिला अलगोजा टूटने पर नया अलगोजा खरीदने के पैसे नहीं थे. उन्होंने अपने कान की मुर्की (बालिया) को बेचकर 350 रुपए से अलगोज ख़रीदा. फिर अलगोजा बनाना सीखने का फैसला लिया और 20 साल में अलगोजा बनाना भी सीखा. रेत के धोरों से उठी अलगोजा की वह मधुर तान, जिसने जंगल की खामोशी से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक अपनी पहचान बनाई, आज उसी साधना, संघर्ष और समर्पण की बदौलत मुलसागर की मिट्टी से निकले तगाराम भील को पद्म श्री से नवाजा जाएगा.
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