Hardik Kaushal Success Story: सफलता पाने के लिए सिर्फ पंख ही नहीं, बल्कि मजबूत हौसले की जरूरत होती है, क्योंकि यही जुनून हर मुश्किल को आसान बनाकर मंजिल तक ले जाता है. चंडीगढ़ के हार्दिक कौशल ने अपनी मजबूत हिम्मत के दम पर कुछ ऐसा ही किया, जिन्होंने सात साल की उम्र में एक एक्सीडेंट में अपने दोनों हाथ खो दिया था, लेकिन इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपने सपनों का पीछा किया. और अब हार्दिक 'धोरों की धरती' राजस्थान में जज की कुर्सी संभालेंगे और लोगों को न्याय दिलाएंगे.
दोनों हाथ कटे फिर भी पास किया राजस्थान सिविल जज 2025 का एग्जाम
सहानुभूति नहीं, लक्ष्य को चुनें
ANI को दिए एक इंटरव्यू में हार्दिक ने बताया कि चैलेंज फिजिकल से ज़्यादा मेंटल होते हैं. अगर हम उन्हें कमजोरी समझकर मान लेंगे, तो अपने गोल से भटक जाएंगे. वही हम, अगर अपने अंदर की ताकत और सेल्फ-कॉन्फिडेंस पर जोर देंगे, तो कामयाबी हमारे हाथ में होगी. उन्होंने बताया कि उनके नाना और उनके माता-पिता हमेशा कहते थे कि इस एक्सीडेंट के बाद लोग तुमसे सवाल करेंगे, और तुम्हारे पास आएंगे. इसलिए, तुम्हें अपनी मेंटल ताकत को मजबूत रखना होगा और यह तय करना होगा कि लोगों के सवालों का सामना कैसे करना है. तुम्हें अपनी मेंटल हालत को मजबूत करना होगा जिससे उनकी बातें तुम्हारे गोल को हिला न सकें.अगर तुम उनकी बातें सुनकर हमदर्दी का शिकार हो गए, तो यह बहुत बुरा होगा क्योंकि यह तुम्हें खुद से दूर ले जाएगा.
पांच से सात साल घर से रहा दूर
इसके बाद हार्दिक ने अपने लक्ष्य को पाने के लिए दिन रात एक कर दिया. जब हार्दिक ने कोहनियों से लिखना शुरू किया तब वह पांच से सात साल अपने घर से दूर रहे. लेकिन उन्होंने कभी उसे सवालों के घेरे में नहीं रखा.उन्होंने मुझसे कभी नहीं पूछा कि क्या मैं यह काम खुद कर सकता हूं. क्योंकि उन्हें पता था कि मैं कर लूंगा. बस अपने होंसलों के जरिए मेरे साथ मजबूती से खड़े रहें.
दिन-रात मेहनत और परिवार के साथ ने दिया हौसला
इसके बाद हार्दिक ने अपना लक्ष्य पाने के लिए दिन-रात मेहनत करना शुरू कर दिया. जब हार्दिक ने लिखना शुरू किया, तो वह पांच से सात साल तक अपनों और अपने घर से दूर रहे. लेकिन इस मुश्किल समय में मेरे परिवार ने मेरा बहुत साथ दिया. उन्होंने मुझसे कभी सवाल नहीं किया. उन्होंने मुझसे कभी नहीं पूछा कि क्या मैं यह काम अकेले कर सकता हूं, क्योंकि उन्हें पता था कि मैं यह कर लूंगा. उन्होंने कभी यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि मैं यह कैसे करूंगा. वह बस अपनी हिम्मत से मेरे साथ मजबूती से खड़े रहे.
सात साल की उम्र में काटने पड़े थे दोनों हाथ
उन्होंने बताया कि उन्हें ऐसा लगा जैसे एक नई शुरुआत हो गई हो. सब कुछ फिर से शुरू करने की. लेकिन इस सफर में उनके माता-पिता ने बहुत साथ दिया. हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद, उन्होंने तुरंत मुझे एक प्रोस्थेटिक हैंड लगवा दिया. मैंने सबसे पहले उसके साथ सब कुछ सीखा. लेकिन इसके बावजूद, खाने जैसी चीज़ों पर मेरी निर्भरता बनी रहती थी, जो मुझे बेहद अखरती थी.
टीचर का खाना खिलना बना लक्ष्य तक पहुंचने का जरिया
इस वजह से स्कूल में मेरे एक टीचर अपना खाना छोड़कर मुझे खाना खिलाने आते थे, जिसका मेरे मन पर गहरा असर हुआ और यह डिपेंडेंस मुझे परेशान करने लगी. यह 3 से 4 साल तक चलता रहा, लेकिन जब मैं क्लास 6 में पहुंचा, तो मुझे लगा कि मैं ये सब काम बिना आर्टिफिशियल हाथों के भी कर सकता हूं. जिसके करने का निर्णय मैंने उसी वक्त ले लिया.
कोहनियों से लिखी सफलता की इबारत
हार्दिक ने आगे बताया कि इसके बाद उन्होंने अपनी कोहनियों के आगे के हिस्से को मसल्स के रुप में काम लेने की कोशिश करने लगे. जिसमें वह उसे फिंगर की तरह इस्तेमाल करते थे. इसके लिए उन्होंने अपनी गर्मी की छुट्टियों का इस्तेमाल किया. इन छुट्टियों में वह कुछ देर एक कमरे में अकेला बैठकर बिना आर्टिफिशियल हाथों के अपनी कोहनी से लिखने की कोशिश करते थे.
डेढ़ महीने तक लिखने की कोशिश की. घर पर किसी को इस बारे में पता नहीं चलने दिया. इसके बाद जब पूरा भरोसा हो गया कि वह बिना आर्टिफिशियल हाथों के लिख सकते है, तब घरवालों को बताया. और इसके बाद 3 साल बाद करीब नौवीं क्लास में उन्होंने अपने नकली हाथ पूरी तरह छोड़ दिए और लिखने और रोज के कामों के लिए सिर्फ अपनी कोहनी पर निर्भर हो गए. उनके पक्के इरादे और लगातार कोशिशों ने आखिरकार उन्हें अपनी शारीरिक कमियों को दूर करने और राजस्थान सिविल जज 2025 में 19वीं रैंक हासिल करके अपने सपने पूरे करने में मदद की.
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