Holi 2026: एशियाड खेलों में धाक जमाने वाली बाड़मेर की 185 साल पुरानी 'गैर' का जादू, आंगी-बांगी पहन एक साथ थिरकीं तीन पीढ़ियां

बाड़मेर के सनावड़ा गांव में धुलंडी के अवसर पर होलिका दहन के अगले दिन गैर नृत्य आयोजित किया. जिसमें पारंपरिक लाल-सफेद 'आंगी' वेशभूषा में सजे सैकड़ों कलाकारों ने ढोल-थाली की थाप पर जमकर नृत्य किया.

विज्ञापन
Read Time: 3 mins
गैर नृत्य करते कलाकार
NDTV

Gair Dance in Barmer: रेगिस्तानी जिले बाड़मेर के सनावड़ा गांव में धुलंडी के अवसर पर लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला. यहां होलिका दहन के अगले दिन गैर नृत्य आयोजित किया गया. जिसमें विश्व प्रसिद्ध गैर नृत्य में परंपरा और आधुनिकता की एक खूबसूरत तस्वीर उभरी, जिसमें पारंपरिक लाल-सफेद 'आंगी' वेशभूषा में सजे सैकड़ों कलाकारों ने ढोल-थाली की थाप पर जमकर नृत्य किया. इस वर्ष के आयोजन की सबसे प्रेरणादायक झलक 'पीढ़ियों का मिलन' रही, जिसमें एक ही परिवार के दादा, पिता और पुत्र ने एक साथ कदमताल करते हुए इस प्राचीन विरासत को जीवंत रखा. तीन पीढ़ियों की इस साझी प्रस्तुति ने  दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया.

गांव सनावड़ा में हर साल होली पर होता है इसका आयोजन

 हर साल धुलंडी पर जिला मुख्यालय से लगभग 33 किमी दूर छोटे से गांव सनावड़ा में इसका आयोजन किया जाता है. जहां हजारों दर्शकों से इस इस नृत्य में शामिल होने के लिए दूर - दराज के इलाकों से आते है. साथ ही ढोल-नगाड़ों की गूंज, थालियों की खनक और गैरियों के समूह नृत्य में खो जाते हैं. इससे पूरा माहौल उत्सव और उमंग से भर जाता है.

महिलाओं की सुरक्षा के लिए हुई थी इसकी शुरूआत

गैर नृ्त्य की सदियों पुरानी परंपरा को लेकर इतिहासकारों और बुजुर्गों का कहना है कि यह नृत्य करीब 185 वर्ष पुराना है.इसकी शुरूआत महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी थी. खेती-किसानी के बाद गैर नृत्य के दौरान पुरुष डंडों से उनकी पहरेदारी करते थे. बाद में डंडों को लय में शामिल कर यह नृत्य गैर के रूप में विकसित हुआ. आज यह सिर्फ नृत्य नहीं, बल्कि पश्चिमी राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान और गर्व का विषय बन चुका है.

एशियाड खेलों के उद्घाटन समारोह दी गई प्रस्तुति

गैर नृत्य की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 1982 में दिल्ली में हुए एशियाड खेलों के उद्घाटन समारोह में बाड़मेर के गैर कलाकारों ने शानदार प्रस्तुति देकर पूरे देश में इसकी धाक जमाई थी. तब से यह नृत्य राष्ट्रीय स्तर पर जाना-जाता है.धुलंडी पर सनावड़ा का यह आयोजन न केवल होली के रंगों को नई ऊर्जा देता है, बल्कि पीढ़ियों को जोड़कर राजस्थानी लोक संस्कृति को जीवंत रखने का माध्यम भी बनता है.

यह भी पढ़ें: Rajasthan News Live: बूंदी के अलोद में होली जुलूस पर हंगामा, धार्मिक स्थल पर रंग गिरने से बढ़ा विवाद, छावनी बना गांव

Advertisement

Topics mentioned in this article