"मंजिल मिले या न मिले, यह मुकद्दर की बात है, लेकिन हम कोशिश ही न करें, यह गलत बात है." यह बात IAS नेहा ब्याडवाल की सफलता की कहानी पर बिल्कुल सटीक बैठती है. लगातार तीन असफलताओं के बाद भी उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया. आखिरकार चौथे प्रयास में उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2021 में ऑल इंडिया रैंक 569 हासिल कर अपना IAS बनने का सपना पूरा किया, और सिर्फ 24 साल की उम्र में गुजरात कैडर से IAS अफसर बन गईं.
राजस्थान के जयपुर में जन्मीं नेहा ब्याडवाल की परवरिश छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में हुई. उनके पिता श्रवण कुमार आयकर विभाग में अधिकारी हैं. नौकरी के दौरान लगातार ट्रांसफर होने की वजह से नेहा को कई शहरों और स्कूलों में पढ़ाई करनी पड़ी. जयपुर के बाद उन्होंने भोपाल, बिलासपुर और कोरबा के अलग-अलग स्कूलों में शिक्षा हासिल की. नए माहौल और नई भाषा के बीच तालमेल बैठाना आसान नहीं था और इसी दौरान वह पांचवीं कक्षा में फेल भी हो गई थीं.
हालांकि, इस असफलता को उन्होंने अपनी पहचान नहीं बनने दिया. आगे चलकर रायपुर के डीबी गर्ल्स कॉलेज में दाखिला लिया और यूनिवर्सिटी टॉपर रहीं. कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद पिता की प्रेरणा से उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी शुरू की, लेकिन यह सफर आसान नहीं रहा और शुरुआती तीन प्रयासों में उन्हें सफलता नहीं मिली.

Photo Credit: Insta/Neha Byadwal
उतार-चढ़ाव से भरी रही पूरी जर्नी
जोश Talks के साथ एक इंटरव्यू के दौरान नेहा ब्याडवाल ने बताया कि, अगर अपनी जिंदगी को एक शब्द में बताना हो तो मेरी पूरी जर्नी उतार-चढ़ाव से भरी रही. कभी सब कुछ अच्छा रहा तो कभी अचानक बड़ी चुनौतियां सामने आ गईं. उन्होंने बताया कि शुरुआती पढ़ाई जयपुर में दादा-दादी के साथ हुई. चौथी कक्षा तक वह उन्हीं के पास रहीं. उस समय घर और आसपास का पूरा माहौल राजस्थानी भाषा का था. ऐसे में अंग्रेजी तो दूर हिंदी बोलना भी उनके लिए आसान नहीं था.
हमेशा बोलने वाली बच्ची क्यों हो गई शांत?
चौथी के बाद वह अपने पिता के पास भोपाल चली गईं. वहां उनका दाखिला एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में कराया गया. नेहा ने बताया कि वहां पहुंचकर उन्हें लगा कि किताबों में क्या लिखा है, वह कुछ भी समझ नहीं पा रही हैं. इतना ही नहीं, उस स्कूल में हिंदी बोलने पर जुर्माना लगता था. जो बच्ची हमेशा बोलती रहती थी, वह अचानक पूरी तरह शांत हो गई. भाषा की समस्या इतनी बड़ी थी कि वह पांचवीं कक्षा में फेल हो गईं. इसके बाद उन्हें दोबारा हिंदी माध्यम में भेजने का विकल्प भी दिया गया, लेकिन उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि हार नहीं माननी है.

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ग्यारहवीं और बारहवीं चट्टान बनकर आईं मुश्किलें
नेहा ने बताया कि पांचवीं (5th) के बाद धीरे-धीरे पढ़ाई और भाषा, दोनों पर मेहनत शुरू की. समय के साथ चीजें बदलने लगीं और दसवीं (10th) तक पहुंचते-पहुंचते उन्हें एक होनहार छात्रा माना जाने लगा. लोग उनसे कहते थे कि उनमें क्षमता बहुत है, बस पढ़ाई पर और मेहनत करने की जरूरत है. उन्होंने बताया कि दसवीं में उनका अच्छा रिजल्ट रहा, लेकिन ग्यारहवीं (11th) और बारहवीं (12th) का समय फिर मुश्किलों से भरा रहा. किशोरावस्था में उन्होंने वही गलतियां कीं जो अक्सर उस उम्र में छात्र कर बैठते हैं. इसका असर उनकी पढ़ाई पर पड़ा और अंक गिर गए. कई बार उन्हें प्रिंसिपल के ऑफिस भी जाना पड़ा.
कॉलेज ने लौटाया खोया हुआ आत्मविश्वास
नेहा ने बताया कि बारहवीं के बाद उन्होंने रायपुर के डीबी गर्ल्स कॉलेज में हिस्ट्री, इकोनॉमिक्स और जियोग्राफी विषयों के साथ ग्रेजुएशन में दाखिला लिया। ग्यारहवीं और बारहवीं के अनुभव से उन्हें बड़ा सबक मिल चुका था. इसलिए कॉलेज के पहले वर्ष में उन्होंने पूरी मेहनत से पढ़ाई की और कॉलेज में टॉप किया.

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यहीं से बदली नेहा की पहचान
नेहा ने बताया कि कॉलेज के दूसरे वर्ष से छात्राएं उनके पास पढ़ाई से जुड़े सवाल लेकर आने लगीं. पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि अब वह दूसरों की मदद करने लायक बन चुकी हैं और लोग उनके जवाब पर भरोसा भी करते हैं. यहीं से उनके अंदर एक नया आत्मविश्वास पैदा हुआ. उन्होंने कहा कि उन्हें बचपन से मंच पर बोलने और वाद-विवाद का शौक था, लेकिन भाषा हमेशा उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा रही. कॉलेज में ऐसा माहौल मिला, जहां उन्होंने वाद-विवाद, एंकरिंग और मंच संचालन जैसी गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू किया. यहीं से उनकी झिझक खत्म हुई और उनकी पूरी व्यक्तित्व यात्रा एक नए मोड़ पर पहुंच गई.
नेहा ने वकालत छोड़ क्यों लिया IAS बनने का फैसला?
नेहा ब्याडवाल ने बताया कि कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका सपना वकील बनने का था. वह लोगों को न्याय दिलाना चाहती थीं. इसी दौरान उनके पिता ने उन्हें अपने पास बैठाया और एक तस्वीर दिखाते हुए कहा कि उस ऊंची चोटी तक उन्हें पहुंचना है. उन्होंने कहा कि मंजिल तक पहुंचने के कई रास्ते हो सकते हैं. कुछ रास्ते ऐसे होंगे जिन पर वह खुद चल सकती हैं, लेकिन उनमें गिरने और भटकने की संभावना भी होगी. वहीं एक ऐसा रास्ता भी है, जिसे वह अच्छी तरह जानते हैं और जिसमें जरूरत पड़ने पर उनका साथ भी दे सकेंगे. नेहा ने बताया कि पिता की बात सुनकर उन्हें लगा कि जब परिवार एक रास्ता दिखा रहा है और उस पर उनका भरोसा भी है, तो उसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए. इसके बाद उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी करने का फैसला किया.

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डाइनिंग टेबल पर चलती थी स्पेशल क्लास
नेहा ने बताया कि उनके पिता आयकर विभाग में अधिकारी हैं, लेकिन वह मानती हैं कि उन्हें सबसे बड़ा फायदा उनके पद से नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व से मिला. पूरा दिन काम करने के बाद भी उनके पिता घर आकर आराम नहीं करते थे. बचपन से ही उनके घर में टीवी देखने की संस्कृति नहीं थी. उन्होंने बताया कि रात के खाने से पहले पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर बैठता था और पिता हर बच्चे से पूछते थे कि आज क्या पढ़ा. इसलिए सभी बच्चे डाइनिंग टेबल पर बैठने से पहले अपनी तैयारी करके आते थे. नेहा ने बताया कि संयुक्त परिवार का माहौल और पिता की पढ़ाने की आदत का सबसे बड़ा फायदा उन्हें यूपीएससी में मिला। खासकर सीसैट (CSAT) पेपर में उन्हें कभी अलग से संघर्ष नहीं करना पड़ा.
2 नंबर से प्रीलिम्स छूटा, 8 नंबर से मेन्स... फिर चौथे प्रयास में बनीं IAS
नेहा ब्याडवाल ने कहा कि, मुझे ऐसा लगता है कि पहले साल तो मैंने अपने आप को पूरा झूठ बोला कि, हां तुम ठीक कर रही हो, लेकिन जब रिजल्ट तो उन्हें खुद भी पता था कि उन्होंने उतनी मेहनत नहीं की थी, जितनी इस परीक्षा के लिए जरूरी थी. उनका मानना है कि हर अभ्यर्थी अंदर से जानता है कि उसने अपनी तैयारी के साथ कितना न्याय किया है. नेहा ने बताया कि दूसरे प्रयास में जब प्रीलिम्स का नतीजा आया तो पता चला कि वह सिर्फ दो अंकों से पीछे रह गई हैं। इस रिजल्ट के बाद उन्हें लगा कि अगर दो अंकों की दूरी रह गई है तो इसका मतलब मंजिल बहुत दूर नहीं है. उन्होंने अपनी तैयारी की प्रक्रिया पर भरोसा रखा और यही विश्वास उन्हें अगले प्रयास के लिए और मजबूत बना गया.

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नेहा ने बताया कि तीसरे प्रयास में उनका प्रीलिम्स निकल गया। इसके बाद उन्होंने पूरी ताकत मेन्स की तैयारी में लगा दी. उन्होंने दिन-रात पढ़ाई की, लेकिन एक बड़ी गलती कर बैठीं. उन्होंने उत्तर लिखने की पर्याप्त प्रैक्टिस नहीं की. उन्होंने कहा कि घर पर उत्तर लिखते समय वह हर पेपर में करीब 10 मिनट देर से खत्म करती थीं. उन्हें लगा कि परीक्षा हॉल में यह समय अपने आप पूरा हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. परीक्षा के दौरान कई उत्तर अधूरे रह गए. यूपीएससी मेन्स में अगर सवाल छूट जाएं तो उसका सीधा असर परिणाम पर पड़ता है. मेन्स का परिणाम आने के बाद उन्हें पता चला कि वह सिर्फ आठ अंकों से चयन से बाहर रह गई हैं। यह उनके लिए सबसे कठिन पल था.
'Failed' के नीचे लिखा था- 'Proud of You'
नेहा ने बताया कि मेन्स का परिणाम आने के बाद उनके पिता ने उनकी मार्कशीट उन्हें भेजी. उस पर ऊपर 'Not Recommended' लिखा था, लेकिन उसी के नीचे पिता ने सिर्फ तीन शब्द लिखे थे 'Proud of You" (मुझे तुम पर गर्व है). उन्होंने कहा कि उनके पिता हमेशा यही सिखाते रहे कि कभी हार नहीं माननी चाहिए. उनका कहना था कि जब इतनी दूरी तय कर ली है तो आगे बढ़कर इससे बेहतर अंक भी लाए जा सकते हैं. पिता की यही बात उनके लिए सबसे बड़ी ताकत बन गई और उन्होंने चौथे प्रयास की तैयारी शुरू कर दी.

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छोटा भाई साथ न देता तो नहीं निकलता फाइनल मेन्स
नेहा ने बताया कि इसी पूरी यात्रा में मेरे भाई-बहन, परिवार के सभी लोगों ने मेरा साथ दिया, लेकिन अगर मेरा छोटा भाई नहीं होता तो मेरा फाइनल मेन्स कभी नहीं निकलता. मैं यह बात खुलकर कहती हूं. उसने मुझे समय का सही इस्तेमाल करना सिखाया. उस समय मेरे भाई का क्रिकेट टूर्नामेंट चल रहा था. मैंने उससे कहा कि मुझे मदद की जरूरत है. वह पढ़ाई में घंटों बैठने वाला इंसान नहीं था, लेकिन बहुत तेज दिमाग का था. उसने मेरे साथ घंटों बैठकर मेरी नोट्स बनाने की प्रक्रिया में मदद की. वह प्रश्नपत्र प्रिंट करके लाता था, स्टॉपवॉच लेकर सामने खड़ा हो जाता था. हमने एक सवाल से शुरुआत की. छह मिनट में पूरा होने वाला उत्तर मैं दस मिनट में लिख रही थी. छह मिनट पूरे होते ही वह उत्तर-पत्र मेरे हाथ से ले लेता था और कहता था, 'ऐसे लिखोगी तो फेल हो जाओगी.' लगातार एक सप्ताह तक अभ्यास करने के बाद छह मिनट का उत्तर छह मिनट में पूरा होने लगा.
घर में हर दिन होता था इंटरव्यू
उन्होंने बताया कि, चौथे प्रयास के फाइनल मेन्स में मेरे सभी पेपर पांच से दस मिनट पहले पूरे हो गए. इतना समय बच जाता था कि मैं अपने उत्तर दोबारा पढ़ भी लेती थी. मेरी इंटरव्यू की तैयारी, प्रीलिम्स और मेन्स की तैयारी से अलग नहीं थी. हमारे घर में रोज इंटरव्यू होता था. मम्मी, पापा, भाई, चाचा, चाची सभी बैठकर पहले संभावित सवाल तैयार करते थे, फिर मेरा इंटरव्यू लेते थे. मॉक इंटरव्यू ने भी मेरी बहुत मदद की.
इंटरव्यू में मैंने वही दिखाया, जो मैं वास्तव में हूं
उन्होंने बताया कि, इंटरव्यू बोर्ड के सामने पहुंचने के बाद शुरुआती घबराहट मुझे भी हुई, लेकिन जैसे ही उन्होंने मुझे 'गुड मॉर्निंग' कहा और बैठने के लिए कहा, मैं पूरी तरह सहज हो गई. मैंने खुद से कहा कि मुझे वही दिखाना है, जो मैं हूं. घबराना नहीं है. आत्मविश्वास रखना है, सकारात्मक रहना है और जो पढ़कर आई हूं, उसी पर भरोसा रखना है. जब ये सारी बातें साथ होती हैं तो आत्मविश्वास अपने आप दिखाई देता है. मेरा इंटरव्यू अच्छा रहा. पूरा माहौल मुस्कुराहट भरा था. मैं भी मुस्कुराते हुए बाहर निकली और बहुत खुश थी.

Photo Credit: IMD Patna
रिजल्ट वाले दिन सब छिपकर रिजल्ट देख रहे थे
नेहा ने बताया कि, जैसे-जैसे रिजल्ट का समय करीब आया, घर में सब एक-दूसरे से कहते थे कि कोई रिजल्ट नहीं देखेगा, पढ़ाई पर ध्यान दो. लेकिन सच यह था कि सब लोग छिप-छिपकर रिजल्ट देख रहे थे. मेरे अलावा सब देख रहे थे. मेरी एक आदत भी बन गई थी. मैंने दो बार अपना रिजल्ट खुद देखा था और दोनों बार मैं असफल रही. जितनी बार किसी और ने मेरा रिजल्ट देखा, परिणाम अच्छा आया. इसलिए इस बार भी मैंने किसी और से ही कहा कि मेरा रिजल्ट वही देखे.
नेहा... नेहा... नेहा......नेहा, क्या हुआ रिजल्ट वाले दिन?
फाइनल रिजल्ट वाले दिन का जिक्र करते हुए नेहा ने बताया कि, चाचा की आवाज सुनते ही समझ गई कि इस बार सपना पूरा हो गया. रिजल्ट वाले दिन मैं घर पहुंची ही थी कि दो मिनट बाद परिणाम आ गया. तभी मेरे चाचा जोर-जोर से मेरा नाम पुकारने लगे, "नेहा... नेहा... नेहा..." उनकी आवाज सुनते ही मुझे समझ आ गया कि कुछ अच्छा हुआ है. मेरे चाचा भी पूरी तैयारी के दौरान रात दो-दो बजे तक मेरे साथ बैठे रहते थे. पढ़ाई नहीं करते थे, लेकिन सिर्फ मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए मेरे साथ बैठते थे. उनकी वह खुशी आज भी मेरे लिए सबसे यादगार पल है. मैं आज अपनी पूरी यात्रा पर गर्व करती हूं. मैंने जो भी गलतियां कीं, जो भी सीखा, उन सब पर मुझे गर्व है. मैं अपने माता-पिता, अपने परिवार, उन सभी लोगों की आभारी हूं जिन्होंने मेरा साथ दिया। मैं हर दिन भगवान का धन्यवाद करती हूं.