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This Article is From Mar 01, 2026

जयपुर की मणिहारों का रास्ता में सजी होली, 79 वर्षीय कारीगर सहेज रहे हैं गुलाल गोटा की परंपरा

राजस्थान में जयपुर की मणिहारों का रास्ता में होली से पहले खास रौनक है. यहां 79 वर्षीय राष्ट्रपति सम्मानित कारीगर आवाज़ मोहम्मद पारंपरिक लाख से गुलाल गोटा बना रहे हैं. सदियों पुरानी यह शाही परंपरा अब सोशल मीडिया के जरिए फिर से लोकप्रिय हो रही है.

जयपुर की मणिहारों का रास्ता में सजी होली, 79 वर्षीय कारीगर सहेज रहे हैं गुलाल गोटा की परंपरा
राजस्थान में जयपुर की मणिहारों का रास्ता में होली से पहले खास रौनक है.

Rajasthan News: राजस्थान की राजधानी जयपुर की पुरानी गलियों में इन दिनों होली की रंगत साफ नजर आती है. खासतौर पर मणिहारों का रास्ता में कारीगर पारंपरिक गुलाल गोटा बनाने में जुटे हैं. यहां के 79 वर्षीय माहिर कारीगर आवाज़ मोहम्मद अपनी कला से इस परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं.

राष्ट्रपति से सम्मानित कारीगर

आवाज़ मोहम्मद को लाख के काम में उनकी बेहतरीन कला के लिए राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जा चुका है. होली के मौसम में वे चूड़ियों का काम छोड़कर गुलाल गोटा बनाने में व्यस्त हो जाते हैं. जयपुर में होली बिना गुलाल गोटा के अधूरी मानी जाती है.

कैसे बनता है गुलाल गोटा

लाख को पहले कोयले की आग पर गर्म किया जाता है. फिर उसे गोल आकार देकर कारीगर उसमें फूंक मारते हैं और लगभग पांच ग्राम वजन के खोखले गोले तैयार करते हैं. इन्हें ठंडा करने के लिए पानी से भरे ड्रम में डाला जाता है. ठंडा होने के बाद इन गोलों में एरोरूट पाउडर से बना सुगंधित गुलाल भरा जाता है और सावधानी से सील कर दिया जाता है. लाल गुलाबी पीले हरे और नारंगी रंगों से भरे ये गोले होली पर लोगों के बीच खुशियां बांटते हैं.

शाही परंपरा से जुड़ा इतिहास

गुलाल गोटा का संबंध जयपुर के शाही इतिहास से भी है. सबसे पहले यह भगवान कृष्ण को अर्पित कर वृंदावन भेजा जाता है. इसके बाद सिटी पैलेस जयपुर की शाही होली के लिए खास डिब्बे तैयार किए जाते हैं. पहले यह राजघरानों और ठिकानों में भेजे जाते थे.

नौ पीढ़ियों से चल रहा हुनर

मणिहारों का रास्ता के कारीगर शब्बीर मोहम्मद बताते हैं कि उनका परिवार नौ पीढ़ियों से लाख की चूड़ियां और गुलाल गोटा बना रहा है. वे अपने पोते को भी यह कला सिखा रहे हैं ताकि यह परंपरा खत्म न हो. होली के तीन महीने जनवरी से मार्च तक ही गुलाल गोटा बनाया जाता है. इसके बाद कारीगर फिर चूड़ियां और लाख के आभूषण बनाने लगते हैं.

सोशल मीडिया से मिली नई पहचान

कभी लुप्त होती यह कला अब सोशल मीडिया की वजह से फिर से लोकप्रिय हो रही है. पर्यटकों की रील्स के कारण दिल्ली और अहमदाबाद जैसे शहरों से भी ऑर्डर मिलने लगे हैं. रंग परंपरा और मेहनत से सजी यह गली आज जयपुर की सांस्कृतिक पहचान को नई चमक दे रही है.

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