राजस्थान में नगर निकाय चुनाव को लेकर सरगर्मी का माहौल है. उम्मीदवारों ने 31 अगस्त तक पर्चे दाखिल कर दिए जो नामांकन की अंतिम तारीख थी. नाम वापस लेने की अंतिम तारीख 3 सितंबर है. चुनाव में जयपुर नगर निगम का चुनाव राजस्थान की राजधानी होने की वजह से विशेष महत्व रखता है. साथ ही प्रदेश के सभी नगर निकायों में जयपुर नगर निगम सबसे बड़ा नगर निकाय है. लेकिन जयपुर नगर निगम के चुनाव को लेकर एक दिलचस्प बात सामने आई है. यहां इस बार के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ही नए चेहरों पर विशेष जोर दिया है. दोनों ही पार्टियों ने 2020 के चुनावों में विजयी रहे अधिकांश पार्षदों को टिकट नहीं दिया है.
बीजेपी-कांग्रेस दोनों ने काटे टिकट
जयपुर ग्रेटर और हेरिटेज नगर निगम चुनावों में 2020 में चुने गए 250 पार्षदों में से केवल 43 को ही इस बार फिर से टिकट मिला है. इसका मतलब है कि 207 पार्षदों, यानी 82.8 प्रतिशत को दोनों प्रमुख पार्टियों ने चुनाव में नहीं उतारा है.
2020 के चुनावों में भाजपा के 139 पार्षद विजयी रहे थे. इनमें से केवल 24 को ही फिर से टिकट दिया गया है, जबकि 115 को टिकट नहीं मिला है.
वहीं कांग्रेस के 2020 के 88 विजयी उम्मीदवार थे, जिनमें से 16 को दोबारा टिकट मिला और 72 को टिकट नहीं दिया गया.
2020 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विजयी रहे 23 पार्षदों में से तीन को इस बार प्रमुख पार्टियों से टिकट मिला है, जिनमें से दो को भाजपा और एक को कांग्रेस से टिकट मिला है.
कुल मिलाकर, 2020 के चुनावों में जीतने वाले 250 उम्मीदवारों में से केवल 43 (17.2 प्रतिशत) को दोबारा टिकट मिला, जबकि 207 (82.8 प्रतिशत) को दोबारा टिकट नहीं मिला. इस प्रकार, 2020 के विजेताओं में से केवल 17.2 प्रतिशत ही दोबारा टिकट हासिल कर पाए हैं, जबकि 82.8 प्रतिशत को टिकट नहीं मिला.
परिसीमन एक बड़ी वजह
हालांकि बड़े पैमाने पर हुए इन बदलावों का एक प्रमुख कारण वार्डों का परिसीमन और पुनर्गठन है. जयपुर में 2020 में अलग-अलग ग्रेटर और हेरिटेज नगर निगम थे, जिनमें कुल 250 वार्ड थे. वर्तमान चुनाव 150 वार्डों के लिए हो रहे हैं. पुनर्गठन ने कई वार्डों की भौगोलिक सीमाओं को काफी हद तक बदल दिया है. इसकी वजह से जो क्षेत्र पहले कई मौजूदा पार्षदों के गढ़ हुआ करते थे, उन्हें अलग-अलग वार्डों में स्थानांतरित कर दिया गया है, जिससे कुछ पूर्व पार्षदों का चुनावी आधार और दावे कमजोर हो गए हैं.
उम्मीदवार बदलने का दबाव
इसी बीच, पांच साल के कार्यकाल के बाद कई पार्षदों को स्थानीय निवासियों और पार्टी कार्यकर्ताओं के विरोध का सामना करना पड़ा है, जिससे भाजपा और कांग्रेस पर नए उम्मीदवार उतारने का दबाव बढ़ गया है. पूर्व विजेताओं की बड़ी संख्या को बदलने का निर्णय दोनों प्रमुख पार्टियों की नई छवि पेश करने और युवा एवं अधिक सक्रिय पार्टी कार्यकर्ताओं को अवसर देने की रणनीति को दर्शाता है.
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