होली के बाद हर साल रोग मुक्ति के लिए मनाया जाता है ये खास त्योहार, बनाए जाते हैं तरह-तरह के पकवान

Rajasthan Festival: जैसलमेर में रोगों से मुक्ति पाने के लिए एक खास त्योहार होली के बाद मनाए जाते हैं, जिसमें माता शीतला की पूजा की जाती है.

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होली के बाद हर साल रोग मुक्ति के लिए मनाया जाता है ये खास त्योहार, बनाए जाते हैं तरह-तरह के पकवान
त्योहार के लिए प्रसाद तैयार करतीं महिलाएं

Basoda Festival 2025: होलिका दहन के बाद आने वाली सप्तमी को राजस्थान के जैसलमेर में एक खास आयोजन किया जाता है, जिसमें शीतला सप्तमी यानी बसौड़ा का पर्व बनाया जाता है. इस दिन शीतला माता का पूजन किया जाता है और बासी खाने का भोग लगाया जाता है. सप्तमी से एक दिन पहले जैसलमेर के घरों में आज बसौड़ा के भोग के किए विभिन्न पकवान तैयार किए जा रहे है. कहते है कि संक्रामक रोगों से मुक्ति दिलाने वाली और चेचक रोग से बचाने वाली देवी ही शीतला माता है और सप्तमी के दिन शीतला माता को ठंडे का भोजन और पकवानों का भोग लगाया गया. इस भोग से परिवार और खासकर बच्चों को होने वाले संक्रमण से माता उन्हे बचाती है. गृहिणियों ने गुरुवार को सप्तमी से एक दिन पहले यानी छठी तिथि को स्वादिष्ठ भोग तैयार किए.

परंपरा के अनुसार चढ़ाए जात हैं पकवान

भोग में प्राचीन परम्पराओं के अनुसार बाजरी की रोटी और दही की राब चढ़ाई जाती थी, लेकिन बदले परिवेश में बाजरी की रोटी और राब के साथ विभिन्न पकवान जाते है. जिसमें- दही, छाछ और घी के भांति-भांति के पकवान बनाए गए. नमकीन पूड़ी, मीठी पूड़ी, दाल की पूड़ी, दही, रायता, करबा, हलवा, लापसी, पुलाव, दही बड़े और कई प्रकार की मिठाइयां छठ के दिन ही बना ली गई है. सबसे खास है राजस्थान के विशेषकर सांगरी की सब्जी, जिसे लोनजी के नाम से भी जाना जाता है.

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चर्म रोग और सन्क्रमित रोगों से होता है बचाव

इस साल यह पर्व 21 मार्च को मनाया जा रहा है. सबसे पहले सुबह उठकर स्नान आदि करने के बाद माता शीतला को का पूजन किया जाता है, जिसमें उन्हे ठंडे पानी चढ़ाकर, फुल चढ़ाकर पूजन होता है, जिसके बाद बासी खाने का भोग लगाया जाता है. साथ ही प्रसाद के रूप में दिनभर बासी खाना खाया जाता है. मान्यता है कि इससे चर्म रोग और सन्क्रमित रोगों से बचाव होता है.

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