10 रुपये के लिए देना होगा 10 लाख का दंड, पार्किंग चार्ज पर उपभोक्ता आयोग ने ठेकेदार को नहीं CMO को ठहराया दोषी

राजस्थान के करौली में अस्पताल पार्किंग में अवैध वसूली का मामला उपभोक्ता आयोग तक पहुंचा. आयोग ने सख्त फैसला सुनाते हुए प्रमुख चिकित्सा अधिकारी को दोषी ठहराया और 10 लाख रुपये उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा कराने के आदेश दिए.

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राजस्थान के करौली में अस्पताल पार्किंग में अवैध वसूली का मामला उपभोक्ता आयोग तक पहुंचा.

Rajasthan News: राजस्थान के करौली जिले में अवैध पार्किंग वसूली को लेकर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने बड़ा और मिसाल कायम करने वाला फैसला सुनाया है. आयोग ने राजकीय सामान्य चिकित्सालय करौली के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी को इस मामले में जिम्मेदार ठहराया है और उपभोक्ता कल्याण कोष में 10 लाख रुपये जमा कराने के आदेश दिए हैं.

क्या था पूरा मामला

परिवादी बाबूलाल मीना निवासी गौमती कॉलोनी करौली ने आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी. उन्होंने बताया कि 8 अक्टूबर 2025 को सुबह वे इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे. वहां मोटरसाइकिल पार्किंग के नाम पर उनसे 20 रुपये वसूले गए जबकि नियमानुसार शुल्क केवल 10 रुपये तय था. इलाज के बाद जब वे वाहन लेने पहुंचे तो कर्मचारियों ने उनकी रसीद ले ली और बाइक के इंडिकेटर व लाइट तोड़ दिए. विरोध करने पर उनके साथ गाली गलौच की गई जिससे उन्हें मानसिक पीड़ा हुई.

विपक्ष का पक्ष कमजोर साबित

ठेकेदार वीरेन्द्र बैंसला ने दावा किया कि 20 रुपये 24 घंटे की पार्किंग के लिए लिए जाते हैं. वहीं प्रमुख चिकित्सा अधिकारी ने तय समय पर अपना जवाब ही पेश नहीं किया. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार आयोग ने उनका जवाब देने का अधिकार समाप्त कर दिया.

टेंडर दस्तावेजों में बड़ी खामी

आयोग की जांच में सामने आया कि पार्किंग शुल्क से जुड़ा मूल टेंडर आदेश प्रस्तुत नहीं किया गया. केवल शर्तों की प्रतियां दी गईं जिनमें मोटरसाइकिल का शुल्क 10 रुपये दर्ज था. रसीद पर 20 रुपये अंकित होना गंभीर अनियमितता माना गया. आयोग ने इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार माना.

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प्रमुख चिकित्सा अधिकारी ठहरे जिम्मेदार

आयोग ने रेस्पोंडेंट सुपीरियर सिद्धांत लागू करते हुए ठेकेदार के बजाय टेंडर जारी करने वाले प्रमुख चिकित्सा अधिकारी को मुख्य रूप से उत्तरदायी माना. परिवादी को 20 रुपये की वापसी 30 दिनों में करने का आदेश दिया गया. मानसिक पीड़ा के लिए 1 लाख 50 हजार रुपये तथा 15 हजार रुपये मुकदमा खर्च देने के निर्देश दिए गए.

इसके अलावा 10 लाख रुपये उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा कराने को कहा गया. तय समय में भुगतान नहीं होने पर 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा. यह फैसला 26 फरवरी 2026 को अध्यक्ष शैलेन्द्र सिंह और सदस्य सुरेन्द्र चतुर्वेदी ने खुले आयोग में सुनाया गया.

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