पांचना बांध पर 'आर-पार': हाईकोर्ट के अल्टीमेटम के बाद हरकत में प्रशासन, 20 साल पुराने विवाद में बढ़ी हलचल 

करौली के पांचना बांध से 20 साल बाद पानी छोड़ने के हाईकोर्ट के सख्त आदेश ने प्रशासन में खलबली मचा दी है. डूब क्षेत्र के गांवों और कमांड एरिया के किसानों के बीच पुराना विवाद एक बार फिर सुरक्षा और राजनीति के लिए बड़ी चुनौती बन गया है.

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पांचना बांध से 20 साल बाद पानी छोड़ने के हाईकोर्ट के सख्त आदेश ने प्रशासन में खलबली मचा दी है.

Rajasthan News: राजस्थान के करौली जिले में स्थित पांचना बांध का विवाद एक बार फिर ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ा है. करीब दो दशकों से सूखी पड़ी नहरों में पानी छोड़ने को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने इस बार इतना सख्त रुख अपनाया है कि प्रशासन से लेकर सरकार तक के हाथ-पांव फूल गए हैं. 1 मई की डेडलाइन और अधिकारियों की व्यक्तिगत पेशी की चेतावनी के बाद अब मैदान में खाकी और खादी दोनों की सक्रियता बढ़ गई है.

हाईकोर्ट का आदेश, अधिकारियों की नींद उड़ी

हाईकोर्ट ने दो टूक शब्दों में आदेश दिया है कि हर हाल में निर्धारित समय सीमा के भीतर नहरों में पानी छोड़ा जाए. आदेश की गंभीरता को देखते हुए एडिशनल चीफ इंजीनियर सुरेशचंद ने खुद मोर्चा संभाला है. नहरों की सफाई और मरम्मत के लिए अभियंताओं की फौज उतार दी गई है. विभाग का स्पष्ट लक्ष्य है कि इस बार कोर्ट की अवमानना न हो और कमांड एरिया के किसानों तक पानी पहुंच सके.

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39 गांव बनाम कमांड एरिया

विवाद की असली वजह 'पहले हक' की लड़ाई है. बांध के डूब क्षेत्र में आने वाले 39 गांवों के लोगों का कहना है कि उन्होंने अपनी जमीन खोई है, इसलिए पानी पर पहला अधिकार उनका है. दूसरी ओर, कमांड एरिया के 35 गांवों के किसान पिछले 20 साल से बूंद-बूंद को तरस रहे हैं. 2005 के बाद से नहरी तंत्र ठप होने के कारण करीब 10 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर होने की कगार पर है.

सामाजिक और राजनीतिक पेच

यह मुद्दा केवल सिंचाई का नहीं, बल्कि जातीय और क्षेत्रीय अस्मिता का भी बन चुका है. गुर्जर और मीणा समुदायों के बीच पुराने सामाजिक तनाव और 2008-2013 के बीच हुए राजनीतिक निर्णयों ने आग में घी डालने का काम किया है. 39 गांवों की योजना को छोटा कर 13 गांवों तक समेटने के पुराने फैसलों ने असंतोष को और गहरा कर दिया है.

प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती

पांचना संघर्ष समिति जहां चंबल से पानी लाने और प्रभावित गांवों को प्राथमिकता देने पर अड़ी है, वहीं प्रशासन के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल की तैनाती के संकेत हैं.

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