Rajasthan News: राजस्थान के कोटा की भामाशाह कृषि उपज मंडी कहने को तो एशिया की दिग्गज मंडियों में शुमार है, लेकिन यहां गेट नंबर 2 के पास खड़ी एक बहुमंजिला इमारत सिस्टम की नाकामी की कहानी कह रही है. करोड़ों रुपये लगाकर 'एग्रो ट्रेड टॉवर' इसलिए बनाया गया था ताकि किसान और व्यापारियों को एक ही छत के नीचे वर्ल्ड क्लास सुविधाएं मिलें. लेकिन अफसोस! पिछले 6 साल से यह टॉवर अपने ही वजूद पर आंसू बहा रहा है.
दाम इतने ऊंचे कि व्यापारियों ने फेर ली नजरें
इस आलीशान टॉवर में 92 ट्रेड ऑफिस, 21 कमर्शियल कियोस्क, कैंटीन और सरस पार्लर समेत कुल 113 दफ्तर तैयार किए गए थे. मंडी प्रशासन ने आवंटन की कोशिश तो की, लेकिन दुकानों की कीमतें (30 से 40 लाख रुपये) इतनी ज्यादा रखी गईं कि व्यापारियों ने वहां कदम रखना भी मुनासिब नहीं समझा. नतीजा यह हुआ कि करोड़ों का प्रोजेक्ट 'फाइलों' और 'तालो' में कैद होकर रह गया.
फाइलों में अटका है समाधान
मंडी सचिव अशोक मीणा का कहना है कि उन्होंने दरों को कम करने के लिए कई बार प्रस्ताव बनाकर ऊपर भेजा है, लेकिन 'साहबों' की मंजूरी का इंतजार अब तक खत्म नहीं हुआ. कोटा की इस मंडी में हाड़ौती ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों से भी किसान अपनी फसल बेचने आते हैं. करोड़ों का टर्नओवर होने के बावजूद इस मॉडर्न टॉवर में सन्नाटा पसरा है. प्रशासन का दावा है कि जैसे ही दरों के संशोधन को मंजूरी मिलेगी, आवंटन की प्रक्रिया दोबारा शुरू कर दी जाएगी.
उम्मीद की 'फाइल' कब आगे बढ़ेगी?
एक्सपर्ट्स की मानें तो अगर इस टॉवर की दरों को जमीन पर लाया जाए (Practical Rates), तो यह कोटा के व्यापार का नया हब बन सकता है. फिलहाल तो यह भव्य इमारत सिर्फ धूल फांक रही है. अब सवाल यह है कि सरकार की फाइलें कब जगेंगी और कब इस 'सफेद हाथी' में वाकई व्यापार की हलचल शुरू होगी.
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