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This Article is From Feb 14, 2026

Mahatma Gandhi Hospital में पहली बार रोबोटिक डोनर हेपेटेक्टॉमी, 19 वर्षीय बेटी ने पिता को दिया नया जीवन

रोबोटिक सर्जरी के कारण डोनर को कम दर्द हुआ, कम दवाइयों की आवश्यकता पड़ी और ऑपरेशन के दौरान रक्तस्राव भी न्यूनतम रहा. साथ ही रिकवरी तेज रही और अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि भी कम रही.

Mahatma Gandhi Hospital में पहली बार रोबोटिक डोनर हेपेटेक्टॉमी, 19 वर्षीय बेटी ने पिता को दिया नया जीवन
Mahatma Gandhi Hospital में पहली बार रोबोटिक डोनर हेपेटेक्टॉमी

राजस्थान में लिवर ट्रांसप्लांटेशन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज करते हुए जयपुर में महात्मा गांधी अस्पताल के सेंटर फॉर डाइजेस्टिव साइंसेज के डॉक्टरों ने पहली बार रोबोटिक डोनर हेपेटेक्टॉमी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है. सेंटर फॉर डाइजेस्टिव साइंसेज के चेयरमैन एवं एचपीबी सर्जरी और लिवर ट्रांसप्लांटेशन विभागाध्यक्ष डॉ. नैमिष एन. मेहता के अनुसार, इस अत्याधुनिक प्रक्रिया में 19 वर्षीय युवती ने अपने पिता को नया जीवन देने के लिए अपने लिवर का एक हिस्सा दान किया. पिता डीकम्पेन्सेटेड लिवर सिरोसिस से पीड़ित थे.

इस सर्जरी में तेज रही रिकवरी

यह सर्जरी अत्याधुनिक रोबोटिक तकनीक की सहायता से की गई, जिससे जटिल लिवर सर्जरी को अत्यंत सटीकता के साथ, न्यूनतम रक्तस्राव और पारंपरिक ओपन सर्जरी की तुलना में छोटे चीरे के माध्यम से संपन्न किया जा सका. रोबोटिक सर्जरी के कारण डोनर को कम दर्द हुआ, कम दवाइयों की आवश्यकता पड़ी और ऑपरेशन के दौरान रक्तस्राव भी न्यूनतम रहा. साथ ही रिकवरी तेज रही और अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि भी कम रही.

डॉ. नैमिष ने बताया कि रोबोटिक डोनर हेपेटेक्टॉमी डोनर की सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है. उन्होंने कहा कि लिविंग डोनर पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति होता है और उसकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होती है. रोबोटिक तकनीक सर्जरी को अधिक सुरक्षित, कम दर्दनाक और बेहतर कॉस्मेटिक परिणाम देने में सहायक साबित हो रही है, जिससे डोनर की सर्जरी के बाद जीवन गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होता है.

डोर और रिसीपिएंट दोनों स्वस्थ

इस जटिल प्रक्रिया को एचपीबी और लिवर ट्रांसप्लांट टीम ने संपन्न किया, जिसका नेतृत्व डॉ. नैमिष एन. मेहता ने किया. टीम में डॉ. विनय महला, डॉ. देवेंद्र चौधरी और डॉ. अनिल गुप्ता शामिल रहे. हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. करण कुमार, एनेस्थीसिया टीम में डॉ. गौरव और डॉ. कौशल का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा. 

सर्जरी के बाद डोनर को बिना किसी जटिलता के डिस्चार्ज कर दिया गया है. डोनर और रिसीपिएंट दोनों स्वस्थ हैं और तेजी से रिकवर कर रहे हैं. यह उपलब्धि राजस्थान में उन्नत लिवर ट्रांसप्लांटेशन के क्षेत्र में एक और मील का पत्थर साबित हुई है और अंतिम चरण की लिवर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए नई उम्मीद लेकर आई है. 

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