राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य पशु ऊंट की लगातार घटती संख्या पर नाराजगी जाहिर की है. अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ऊंट संरक्षण कानून बनने के बाद इनकी संख्या आधी रह गई है, लेकिन सरकार इस पर कोई ध्यान नहीं दे रही. कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेने की हिदायत दी. हाईकोर्ट स्वप्रेरणा से दर्ज जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी. सुनवाई के दौरान सरकार ने जवाब पेश करने के लिए समय मांगा है. फिलहाल मामले की सुनवाई अप्रैल तक टाल दी गई है.
ऊंटों की संख्या तेजी से घटी
मामले में न्यायमित्र अधिवक्ता प्रतीक कासलीवाल के अनुसार, 2015 में ऊंट को राज्य पशु घोषित कर संरक्षण कानून लाया गया था. लेकिन उसके बाद ऊंटों की संख्या तेजी से घटी. 2004 में प्रदेश में 7.5 लाख ऊंट थे, 2015 में 3.26 लाख रह गए. चार साल बाद 2019 में यह 2.13 लाख और 2021 तक घटकर करीब 1.5 लाख हो गए. हाईकोर्ट ने 2022 में स्वप्रेरित संज्ञान ले सरकार से जवाब मांगा, लेकिन जुलाई 2022 से अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.
ऊंटों की खरीद-बिक्री ठप
उन्होंने बताया की कानून लागू होने से ऊंटों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया, जिससे पशु मेलों में उनकी खरीद-बिक्री ठप हो गई. पशुपालकों की रुचि कम हो गई. जिले से दूसरे जिले या राज्य बाहर ले जाने के लिए जिला कलेक्टर से अनुमति लेनी पड़ती है, जो लंबी और जटिल प्रक्रिया है—कई बार महीनों लग जाते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि कानून सिर्फ वध रोकने तक सीमित है. चरागाहों की कमी और ऊंटनी के दूध जैसे उत्पादों के बाजार विकास पर कोई ध्यान नहीं. 2022 में विधानसभा में सरकार ने स्वयं माना था कि कानून में संशोधन जरूरी है, लेकिन अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया.
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