'ओरण बचाओ' का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, 7 अप्रैल को होगी मामले की सुनवाई; आंदोलनकारियों की जगी उम्मीद

स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि ओरण को वन कानूनों से ऊपर उठकर मौलिक अधिकारों का संरक्षण मिलेगा. याचिका में मांग की गई है कि ओरण के धार्मिक महत्व को 'अनिवार्य धार्मिक अभ्यास' के दायरे में देखा जाए.

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‘ओरण' भूमि के संरक्षण को लेकर वर्षों से चल रहा संघर्ष अब देश की सबसे बड़ी अदालत की चौखट तक पहुंच गया है. विधि सेतु फाउंडेशन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संविधान पीठ सुनवाई करेगी. यह सुनवाई 7 अप्रैल को प्रस्तावित है और इसे काफी निर्णायक माना जा रहा है. याचिका में ओरण भूमि को केवल ‘डीम्ड फॉरेस्ट' नहीं, बल्कि ‘भूमि-आधारित धर्म' (Land-based religion) का हिस्सा बताया गया है. साथ ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षण देने की मांग की गई है. 

याचिका में धार्मिक आस्था का दिया गया हवाला

याचिका में कहा गया है कि ग्रामीण समुदायों की धार्मिक आस्था इन ओरणों से गहराई से जुड़ी है, जहां पेड़ों की कटाई और शिकार पर सदियों से धार्मिक प्रतिबंध रहे हैं. ऐसे में इन परंपराओं को ‘धार्मिक संयम' मानते हुए संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करना जरूरी है.

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पर्यावरण प्रेमी व अधिवक्ता धर्मवीर सिंह बताते हैं कि 'ओरण बचाओ पदयात्रा' पिछले 75 दिनों से अपनी विरासत को बचाने की लड़ाई जारी है. हम चाहते हैं कि न्यायालय ओरण के धार्मिक महत्व को 'अनिवार्य धार्मिक अभ्यास' (Essential Religious Practices) के दायरे में देखे. 

725 किमी लंबी पदयात्रा में गूंजा मुद्दा

हमें उम्मीद हैं कि अब ओरण को वन कानूनों से ऊपर उठकर मौलिक अधिकारों का संरक्षण मिलेगा, जिससे यहां कई परियोजनाओं के कारण हो रहे भूमि विचलन पर रोक लग सकेगी. बता दें कि तनोट से शुरू हुई 725 किलोमीटर लंबी ‘ओरण बचाओ पदयात्रा' ने इस मुद्दे को जन-जन तक पहुंचाया है. अब पूरे प्रदेश की निगाहें 7 अप्रैल की सुनवाई पर टिकी हैं. अगर सुप्रीम कोर्ट ओरणों को धार्मिक अधिकारों के तहत संरक्षण देता है तो यह न केवल राजस्थान, बल्कि पूरे देश में आस्था आधारित पर्यावरण संरक्षण के लिए एक ऐतिहासिक मिसाल साबित हो सकता है.

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